छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में सोमवार को उस समय हालात तनावपूर्ण हो गए, जब जामड़ी पाटेश्वर धाम के विरोध और विभिन्न मांगों को लेकर सर्व आदिवासी समाज के हजारों लोग कलेक्टोरेट घेराव के लिए बालोद पहुंचे। जिले के तुएगोंदी, जामड़ी और आसपास के गांवों से पहुंचे आदिवासी समाज के लोगों का विशाल जनसैलाब प्रशासन की तमाम तैयारियों पर भारी पड़ गया।
आंदोलन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई प्रदर्शनकारी पूरे दिन परिसर में डटे रहे। कुछ लोगों ने वहीं लकड़ी का चूल्हा बनाकर पोहा तैयार किया और सामूहिक रूप से भोजन भी किया। इससे साफ संकेत मिला कि आदिवासी समाज अपनी मांगों को लेकर इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में है।
क्या है जामड़ी पाटेश्वर धाम को लेकर विवाद.?
सर्व आदिवासी समाज का आरोप है कि जामड़ी स्थित पाटेश्वर धाम का निर्माण ग्रामीणों की जमीन पर किया गया है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि गांवों के विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं का लाभ भी धाम परिसर में पहुंचाया जा रहा है, जबकि मूल ग्रामीण सुविधाओं से वंचित हैं। आदिवासी समाज का यह भी आरोप है कि उनके पारंपरिक धार्मिक स्थल और आस्था के केंद्र ‘पाट’ (पहाड़) पर भी कब्जा कर लिया गया है।
समाज के अनुसार यह स्थान उनके देवी-देवताओं और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए वे जामड़ी पाटेश्वर धाम और उससे जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
बाबा बालक दास पर कार्रवाई की भी मांग
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित करने वाले मामलों में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं की जा रही है। इसी कारण समाज ने जामड़ी पाटेश्वर धाम और बाबा बालक दास के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और अधिकारों का मामला है।
‘वनवासी’ शब्द के इस्तेमाल का भी किया विरोध
आंदोलन के दौरान सर्व आदिवासी समाज ने जिला प्रशासन के माध्यम से केंद्रीय गृह मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में ‘आदिवासी’ शब्द के स्थान पर ‘वनवासी’ शब्द के उपयोग पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई गई। समाज का कहना है कि आदिवासी समुदाय देश के मूल निवासी हैं और उनकी पहचान को बदलने का कोई भी प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा।
