नकटी के नमकहराम कौन?
छत्तीसगढ़ में पहली बार ऐसा हुआ की किसी गांव के एक वार्ड को उजाड़ने के लिए प्रशासन ने रात दस बजे बुल्डोजर भेजा, जनता हैरान परेशान, रात खाना बनाना तो दूर उस रात से उनका घर खाना बनाने लायक ही नहीं बचा!
दूसरे दिन की सुबह से शुरू हुआ महाभारत, जी हां महाभारत ही कहें, पहले सांसद फिर विधायक के घर पीड़ितों की गुहार, आश्वासन और आखिरकार किसी की नही चली और लगभग 80 परिवारों को बेघर होना पड़ा!
प्रशासन ने अपनी पीठ खुद थपथपाई यह कह कर की सबको नवा रायपुर में फ्लैट दे दिया गया पर इसकी सच्चाई कुछ और निकली, ग्रामीण सामूहिक परिवारों को एक कमरे के फ्लैट दिए गए दर्जनभर लोगों का परिवार आखिर उस एक कमरे में कैसे गुजारा करता भला?
और करेले पर नील चढ़ा, चार माले के फ्लैट पर बुजुर्गों , बच्चों को तीसरा चौथा माला कैसे रास आता भला?
पीड़ितों ने फ्लैट से निकलकर फिर से टूटे मकानों में तिरपाल तान लिए, लड़ाई शुरू हुई, कांग्रेस, जोहार छत्तीसगढ़ क्रांतिसेना, सर्व छत्तीसगढ़िया समाज, साहू समाज ऐसे करके दर्जनों संस्था, दल, सेवा संस्थानों ने उजड़े नकटी गांव में लंगर खोल दिया, भूख हड़ताल भी जारी है।
इस नकटी गांव ने तमाम युट्यूबर्स मीडिया को भर भर के मसाला दिया, रोती बिलखती महिलाएं बच्चे, बुजुर्ग, किसी ने कुछ बताया, किसी ने कुछ रोना रोया, कलेक्टोरेट घेराव, मंत्री बंगला, मुख्यमंत्री निवास के सामने प्रदर्शन हुआ।
इन सब में मासूम बच्चों का बड़ा नुकसान हुआ, पढ़ने वाले बच्चों की किताबें मलबे में दब गई तो किसी ने टूटे मकानों में आसरा खोजा और मीडिया ने इसे गंभीरता से पीड़ितों के दर्द के साथ सोशल मीडिया पर परोसा, सांसद और विधायक को इतनी गालियां शायद प्रदेश निर्माण के बाद यह पहली बार था?
आखिर घर टूट जाने का दर्द, बेघर हो जाने की पीड़ा, बच्चों को खुले मैदान में सुलाने का कहर कोई कैसे भूले?
छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार और विधानसभा धरसींवा के विधायक पद्मश्री अनुज शर्मा ने तो सोशल मीडिया हेंडल्ड में अपने टॉकिंग बॉक्स ही बंद कर दिए आखिर भयंकर भद्दी गालियां और पीड़ितों के मुंह से निकले बद्दुआ कैसे सुन पाते भला?
इस बीच चारागाह की इस जमीन पर बनने वाली विधायक कॉलोनी की चर्चा और विधायकों को फोकट में मिलने वाली कीमती जमीन को लेकर भी मामला गर्माया, कांग्रेस के विधायकों ने चिट्ठियां लिखनी शुरू की, नही चाहिए गरीबों का घर उजाड़ कर हमें बंगले!
तकनीकी पॉइंट्स पर भी बात आई, आखिर चारागाह की जमीन पर सरकार का अधिकार कैसे और क्यों?
छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के एक पदाधिकारी ने तो अपने खर्च पर कोर्ट लड़ने की भी घोषणा कर दी पता नही न्यायालय तक पहुंचें भी के नही?
इधर एक पत्रकार ने जिस पर कथित रूप से विधायक का दोस्त होने का आरोप है ने बकायदा इस कार्रवाई को सही ठहरा दिया और उस जगह पर बसे लोगों को बाहरी साबित करते हुए यह बताने की भी कोशिश हुई की इस कारवाई से गांव की आबादी खुश है?
इन सब के बीच यह मुद्दा दबता चला गया की उन बेघर लोगों का क्या होगा और आखिर उस कीमती जमीन पर यह चक्र किसने, क्यों रचा?
इसी बीच जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी के मुखिया अमित बघेल जेल से छूटें और नकटी पर बयान आ गया की उनके और साथी अजय यादव के नही होने के चलते प्रशासन यह कार्रवाई कर पाई वरना…तो फिर संगठन के अन्य लोगों में ताकत नहीं है या फिर व्यक्तिवाद ही संगठन का पर्याय है?
नकटी को टूटने से एकबार अमित बघेल का संगठन बचा चुका था ऐसा दावा किया जाता रहा और इस बार अमित बघेल के जेल में होने का मौका देखकर प्रशासन ने बुल्डोजर भेजा था?
अब मकानों को तोड़ दिया गया है और शुरू में भारी संख्या में सहयोग के लिए या यूं कहें राजनीतिक लाभ के लिए पहुंचने वाले नेता, समाजसेवक अब इलाके से नदारत हैं, पीड़ितों को खाना खिलाने वाले भी अब नजर नहीं आ रहें यानी अब जिनको जख्म लगा है दर्द उन्ही का?
लेकिन इन सबके बीच चर्चा का विषय बना हुआ है यूट्यूब पर पीड़ितों को गलत बताने वाली खबर जिसमें नकटी के निवासी अपना आधार कार्ड दिखा कर बता रहे हैं की वो जो टूटा है वह उनका गांव नही है बल्कि वार्ड नंबर 17 है जो जबरन बसा था, उनका कहना है की वे लोग उनके गांव के थे ही नहीं!
बल्कि गांव से बिहाई बेटी के ससुराल से आकर बसे लोग थे जिन्होंने बेजा कब्जा कर घर बनाया था, जायज गरीब जिनकी संख्या 16 है उन्हें सरकार ने विस्थापन दे दिया है और जो लोग रोने धोने और पीड़ित होने का दिखावा कर रहें हैं वे नकटी गांव के थे ही नहीं?
इस पर बड़ा बयान देते हुए जेसीपी के अमित बघेल कहते हैं की बेटी दामाद को बसाना गलत नही है बल्कि छत्तीसगढ़ के हर गांव में दामाद पारा होता है ऐसे में नकटी की यह बसाहट जायज है?
तो वहीं सोशल मीडिया में यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है की छत्तीसगढ़ियों की यही आदत इन्हें पीछे करने के लिए काफी है अपने लोगों ने जमीन पर कब्जा किया तो गलत वहीं पास ही रसूखदारों ने सैकड़ों एकड़ पर कब्जा जमाया है तो वह जायज?
और इस तरह यह विवाद सोशल मीडिया पर गहरा रहा है लेकिन भौतिक जगह पर प्रशासन ने बैरिकेटिंग कर दी फेंसिंग घेर दिया और सरकारी ताले जड़ दिए हैं।
एक पत्रकार ने इस विषय पर बड़ा खुलासा करते हुए जो बातें लिखी हैं वह ऐसा है की इस कीमती जमीन पर सरकार निजी बिल्डरों के साथ मिलकर रसूखदारों के लिए कॉलोनी बसाने की योजना बनाई बैठी है?
पत्रकार देवेंद्र किशोर गुप्ता ने यह बता कर चौका दिया की उक्त गांव से लगे भू राजस्व रिकार्ड में अलका डेवलपर्स के साथ अधिकृत शौर्य सिंह सिसोदिया पिता विक्रम सिंह सिसोदिया जो की पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह के OSD हैं, पत्रकार ने सवाल किया है की नकटी में विधायक कॉलोनी बनाने का फैसला कब हुआ और किस समयावधि में उनके OSD द्वारा वहां जमीन खरीदी गई इस का खुलासा हो, उन्होंने सवाल पूछा है की क्या सरकारी आवास योजना की जानकारी सार्वजनिक थी?
यह जानकारी काफी है की वास्तव में नकटी गांव की उक्त जमीन क्यों खाली कराई गई है?
एयरपोर्ट के इतने करीब सोने के भाव वाली इस जमीन के आस पास बड़े बड़े रसूखदार बिल्डर और नेताओं के रिश्तेदारों ने पहले ही जमीन खरीद रखे हैं क्योंकि उनको सरकार की योजना का अंदर से पता था कि वहां क्या बनना हैं ऐसे में यह एक बड़ा संयोजित तरीके से भूमाफियाओं को जमीन देने का राजनीतिक षड्यंत्र हो सकता है?
वैसे आपको बताते चलें की जिस शिकायतकर्ता के न्यायलय प्रतिवेदन पर इस जमीन को खाली कराने का निर्णय आया है वह आवेदक भिलाई के कोई चंद्राकार हैं जिन्होंने अपने लगानी जमीन तक रास्ता न होने के कारण बेजा कब्जा हटाने और सरकारी जमीन से होकर अपने लिए रास्ता मांगने तहसील में प्रतिवेदन लगाया था जिस पर कार्रवाई करते हुए इतना बड़ा खेल खेला गया है!
कानूनन गावों में ऐसी व्यवस्था है की जब परिवार बढ़ जाते हैं तब परिवारों को गांव में ही पंचायत प्रस्ताव करके ढाई डिसमिल रहवासी भूमि आवंटित कर दी जाती है जो ग्राम सभा और पंचायत प्रतिनिधियों का अधिकार होता है जैसा कि प्रायः ग्राम पंचायतों में देखा जा सकता है।
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद से प्रदेश में जमीनों की हेराफेरी, जमीन चोरी जैसे मामले तेजी से सतह पर आ रहे हैं, इसका सबसे बड़ा कारण है राज्य का तेजी से औद्योगिकीकरण, बड़े बड़े उद्योग जमीनों पर ही खड़े होने हैं और इसकी जानकारी सत्ता में बैठे लोगों को पहले हो जाती है और फिर वे अपने नाते रिश्तेदारों या संबंधियों के साथ मिलकर जमीनों की हेराफेरी का खेल खेलते हैं?
राजधानी से सभी दिशाओं में सौ किलोमीटर तक अब किसी मूल निवासी छत्तीसगढ़िया जमीन का मालिकाना हक नही रखता बल्कि परप्रांत सरनेम वाले लोगों के नाम जमीनें बिक चुकी है और इसी के साथ आम छत्तीसगढ़िया का स्वाभिमान भी?

आलेख: गजेंद्ररथ गर्व, संपादक – प्रदेशवाद, प्रदेश अध्यक्ष – छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ
