बस्तर और सरकारें: सोना के बदले गाय भैंस का वस्तु विनिमय, चिरौंजी के बदले नमक देने जैसा!
छत्तीसगढ़ का बस्तर नक्सल मुक्त हो चुका है, लगभग पांच दशकों से लाखों लोगों की बलि लेने वाली विचारधारा क्या सचमुच ख़त्म हो गई?
नक्सली कौन थे, कहां से आए थे, क्यों सिस्टम के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे, आखिर वे चाहते क्या थे?
बहुत से सवाल मन को मथते है, सच में नक्सली बस्तर के जंगलों की रखवाली करते थे, रूढ़ी परंपराओं की रक्षा करते थे?
या फिर यह दलम खौफ पैदा करके सिर्फ लेवी वसूलती थी?
हर किसी ने नक्सलियों को अपने अपने तरह से परिभाषित किया, किसी ने इन्हें सभ्य समाज के लिए खतरा कहा तो किसी ने आदिम परम्पराओं के लिए लड़ने वाले लड़ाकू!
पर अब परिस्थियां बदल गई है, नक्सल मुक्त बस्तर अब विकास की नई इबारत लिखेगी, ऐसा भारत के गृहमंत्री ने कहा है और अब उनकी बातों का सार ढूंढते हैं।
बस्तर छत्तीसगढ़ का अद्वितीय अभिन्न हिस्सा है, जंगल, पर्वत, नदियां और भोले भाले आदिवासी, उनकी परंपराएं दुनियाभर के लोगों को आकर्षित करती रही है, घोटूल पर तो पश्चिमी फिल्ममेकरों ने कई वृतचित्र रचे, दुनिया का पहला टार्जन भी इसी बस्तर ने दिया लेकिन आखिर क्यों समय की धारा ने बस्तर का सुकून छीन लिया कैसे नक्सल पैदा हुए और क्यों?
इसका जवाब है शोषण, बस्तर लंबे समय से मुख्यधारा विहीन रही, सरकारी योजनाओं से अनजान वस्तु विनिमय से जीने वाला बस्तर को जब तथाकथित बुद्धिजीवियों ने लूटना शुरू किया तब भोले भाले आदिवासी बागी बने और शायद यहीं से नक्सली जन्में?
लगभग पांच दशक बस्तर की धरती खून के आंसू रोती रही क्यों?
यहां सरकार और जनतानासरकार के बीच द्वंद जारी रहा, झीरम कांड जैसा जख्म भी छत्तीसगढ़ को इसी बस्तर से मिला और हजारों सुरक्षाबल के जवानों के साथ हजारों हजार मासूम गांव वाले भी इसी नासूर की बलि चढ़ गए।
सच में बस्तर प्रकृति की अनुपम रचना है, अद्वितीय इसी लिए लिखा मैंने क्योंकि यह धरती दैवीय है, यह आम जगहों से कुछ अलग है जो दुनियाभर को अपनी ओर आकर्षित करती है।
अकूत खनिज संपदा से भरी बस्तर की धरती देश को लोहा दे रही है साथ ही वनसंपदा का खजाना भी लूटा रही है।
कई खनन कॉरपोरेट्स यहां नजरे गड़ाए बैठे हैं ऐसे में सरकारों का यह कहना की बस्तर को सुरक्षित रखा जायेगा न जाने कितना सही है?
बस्तर में शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं का विकास मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा बहुत कम हुआ है पहले तो सरकारें इन्ही पर काम करें फिर दूसरी प्रमुख बात, यहां के मूलनिवासियों का जीवनस्तर ऊंचा उठाना हो।
खेती, पशुपालन जैसी बाते अभी हाल ही में देश के गृहमंत्री ने कही लेकिन क्या आज जब बस्तर औद्योगिकीकरण के लिए कॉरपोरेट्स को परोसे जा रहे हैं ऐसे में उनकी बातें बेमानी सी नही लगती?
बस्तर शुरू से ही वनोपज पर आश्रित रहा है जिसके लिए वनों का होना ही मुख्य शर्त है पर जब औद्योगिक घराने यहां जंगलों को काट कर उद्योग स्थापित करेंगे तब जंगलों में रहने वालों का क्या होगा, जंगल पर आश्रित बस्तर के जीवन का क्या होगा?
देश बस्तर से बहुत कुछ ले रहा है पर बदले में लौटा क्या रहा है?
क्या बस्तर में राष्ट्रीय स्तर की कोई यूनिवर्सिटी है, कोई ऐसा संस्थान जो यहां के युवा को मौके उपलब्ध करा सके, ऐसी कोई व्यवस्था है?
बस्तर के लिए अभी भी दिल्ली दूर है भले ही दिल्ली रोज बस्तर घूम रही हो!
दुनियाभर के कार्पोरेट बस्तर में नए उद्योग के लिए मौके देख रहे हैं और आम बस्तरिहा अपने जंगलों को उजड़ता, बाहरी लोगों को अपने शांत घरों में घुसता देख रहा है!
छत्तीसगढ़ सरकार की प्राथमिकताएं क्या है बस्तर के लिए? सिर्फ इतना की नक्सल छोड़ मुख्यधारा में लौटे लोगों का विस्थापन या फिर उन बस्तरिहा परिवारों की सांस्कृतिक सुरक्षा जिन्हें पहले नक्सलियों ने फिर बाद में सुरक्षाबलों ने और अब सरकारें अस्थिर करने में लगी हैं?
छत्तीसगढ़, केंद्र सरकारों के लिए हमेशा से एक उपनिवेशिक राज्य ही रहा है, मुझे तो यह भी शंका है की कहीं अकूत खनिज संपदा को लूटने के लिए ही तो इस भूभाग को अलग राजकीय पहचान नहीं दी गई?
आज जिस तरह से छत्तीसगढ़ में वनसंपदा और खनिज के खजाने लूटे जा रहें, मूलनिवासियों को गांव के गांव खदेड़े जा रहे, कहीं ऐसा तो नहीं ये सरकारों की कॉरपोरेट्स के साथ मिलकर चली कोई चाल है?
2700 किलो सोना और अरबों की खनिज संपदा देश पर लुटाने वाली छत्तीसगढ़ महतारी के संतानों को बदले में जब गाय भैंस देने की बातें हो रही हो तब इसे क्या ही कहा जाए?
एक दशक से छत्तीसगढ़ अकुला रहा है, देख, समझ रहा है अपनी स्थिति को भलीभांति!
स्थानीयता और भाषाई अस्मिता के साथ अपनी पारंपरिक पहचान के लिए जागता छत्तीसगढ़, कॉरपोरेट्स को कहां सुहाने वाला है, उलगुलान की पुकार प्रदेश को जगा रही है, अपने जल जंगल जमीन को गंवाता छत्तीसगढ़ अब सवाल कर रहा है, आने वाला समय बड़े बदलाव की जन्मदात्री होगी!
आलेख: गजेंद्ररथ गर्व, प्रदेश अध्यक्ष
छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ, 9827909433
