सत्ता और सट्टा…पढ़ें गजेंद्ररथ का राजनीतिक व्यंग्य!

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सत्ता और सट्टा!

छत्तीसगढ़ की सत्ता में सट्टा का बड़ा योगदान है, चाहे वह पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार हो या फिर अभी सुशासन साय की जीरो टॉलरेंस वाली सरकार, बराबर सट्टा का खेल जारी है और आए दिन इसकी परतें खुलते रहती है।

वैसे देखा जाए तो इस शब्द का इंग्लिश लिखावट एक जैसा ही है SATTA यानी सत्ता या फिर सट्टा भी पढ़ सकते हैं!

महादेव जूस से बुक तक का सफर तय कर भिलाई की गलियों से दुबई की बुर्ज खलीफा तक पहुंचने वाले सौरभ चंद्राकर हो या फिर सोशल मीडिया इनफ्लूइंसर बाबू खेमानी सब SATTA के शह पर पनपने वाले खिलाड़ी हैं।

सट्टा आखिर कैसे कमाता है पैसा?

जमाना डिजिटल हो चुका है, अब एप से ट्रैप वाली दुनिया है, पहले के जमाने में लॉटरी की टिकटें बिकती थी और अब ऑनलाइन सट्टा का बाजार चुपचाप करोड़ों अरबों का खेल करती है!

खाईवाल अब तो शाम को मौसम कैसा रहने वाला है इस आशंका पर भी सट्टा खेला रहे हैं और आज की पीढ़ी जो एक झटके में बिना मेहनत के अमीर बनने का सपना देखती है वही इनके शिकार हैं, गांव शहर कस्बा कहीं ऐसा नही जहां सट्टा का जाल न फैला हो।

आपका जवान लड़का कहीं अकेले चुपचाप मोबाइल पर लगा है तो आप सतर्क हो जाइए, नही जी! किसी लड़की का चक्कर नही सट्टे का नशा उसे अपने गिरफ्त में ले रहा हो सकता है!

राजधानी रायपुर, भिलाई, बिलासपुर, रायगढ़ और न जाने कहां कहां सट्टा बाजार फैला है और इनके तार किन किन देशों तक पहुंचा हुआ है पर हां सट्टा से खेलने वाले का कम, खेल करने वाले का ज्यादा फायदा होता है, फायदा मतलब इतना की, सत्ता को भी नचा लेने जितना!

कांग्रेस सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री के लिए सट्टा ही कारण बना था पुत्र वियोग का और अब न जाने किसकी बारी है? क्योंकि छत्तीसगढ़ की राजनीति में अभी सट्टा संवाद चल रहा है।

रायगढ़ में पकड़े गए सट्टेबाज का बीजेपी के बड़े नेता मंत्रियों संग सांट कर पूर्व मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर जो छिड़का वही उल्टा उनके कपड़ों पर बिखेरते हुए युवा वित्तमंत्री ने जो लिखा तो वीरू बाबा को लग गई और राजाजी नाराज हो गए फिर उसे मनाने युवामंत्री ने उन्हें चने के झाड़ पर भी चढ़ा दिया और सट्टा कथा राजनीति का पहिया पहने अभी भी आगे बढ़ ही रही है।

सट्टा को लेकर ज्यादातर आरोप बड़े नेता मंत्रियों के साथ छूट भईए किस्म के नेताओं, पुलिस के आला अफसरों पर भी लगे यानी मलाई, मिठाई की पोटली सब में बांट कर सट्टा की सत्ता स्थापित रखी जाती रही है, अब यह सिस्टम का हिस्सा है?

राजधानी के करीब तिल्दा पालिका सट्टा को लेकर खासी चर्चा में रहती है, तिल्दा के सट्टेबाजों की चर्चा सात समंदर पार भी होती है, कहते हैं यहां एक कद्दावर भाजपा नेता मंत्री का करीबी और सत्ता के शह पर सट्टा का खेल चलाता है, यहां सट्टा पर प्रतिष्पर्धा भी होती है, विरोधी सट्टा संचालकों का क्लू भी यही महानुभाव पुलिस टीम को देकर पकड़वाता है और अपना धंधा बेधड़क सत्ता के दम पर चलाता है?

यानी सट्टा खेलने वालों के घर में भले ही आग लगे, सट्टा चलाने वालों का गल्ला जरूर भरा रहता है, अब तो कई युवा बकायदा इसे स्टार्टअप भी मानने लगे हैं, सोशल मीडिया साइट्स पर इसके एप इंस्टॉल करने विज्ञापन चलते हैं, क्या सरकार इसे कानून के दायरे में मानती है?

कुल मिला कर सत्ता तक पहुंच बनाने सट्टा बाजार में घुसना जरूरी है!

तिल्दा पालिका में तो पिछला चुनाव सट्टा खाईवालों ने ही फाइनेंस किया था ऐसी चर्चा है, यहां तक कि विधानसभा, लोकसभा चुनावों को भी सट्टे के संगठित अपराध से जुड़े लोग ही आर्थिक गति देते हैं?

फिर ऐसे में सत्ता और सट्टा का संबंध करीब का होना तो लाज़िमी है यानी दोनों लगभग भाई ही हुए?

शायद इसीलिए अंग्रेजों की भाषा में इस बला की लिखावट सत्ता से मेल खाती है “SATTA”

गजेंद्ररथ गर्व, संपादक – pradeshvad.com

 

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