अलविदा दोस्त…!!
13 मई मेरी बेटी का जन्मदिन था मैं घर पर ही पूरा समय बेटी के साथ उसकी शर्त का पालन कर रहा था, लगभग पौने चार बजे एक कॉल आया तो पता चला भूपेंद्र नही रहा, एक पल को भरोसा नहीं हुआ, मन व्याकुल था, मैं भूपेंद्र भाई के पार्थिव देह का दर्शन कर लू इस गरज से तौरी फौरी में घर से निकल गया।
भूपेंद्र यूं तो मुझसे दो साल छोटा था पर हमारी दोस्ती जिगरी थी।
वर्ष 2002 में मार्कफेड की नौकरी के दौरान बहुत से साथी मिले उनमें भूपेंद्र से मेरी भारी नजदीकी और यारानगी रही।
हम दोनों की शक्लें और अक्ल भी कुछ कुछ एक से थे, हम दोनों समोसा प्रेमी थे।
कार्यालय के मुख्य लेखाधिकारी भी हम दोनों ही हुआ करते, पवन चंद्राकर भैया, दिलीप भैया, डागा कका सब साथ में लंच करते, यही हमारा परिवार था।
घूमने भी सब साथ जाते गरियाबंद में मैनपुर के अंदर जंगल और पहाड़ों में ट्रैकिंग का मजा हो या कवर्धा भोरमदेव या फिर उड़ीसा भीमाशंकर, बहुत सी यादें रास्ते भर ताजा होती रही, मैं आखरी बार भूपेंद्र का चेहरा देखना चाहता था, मेरा भाई, मेरा साथी आखिर क्यों असमय चला गया!
कह रहे थे भूपेंद्र ने आत्महत्या कर ली है, मैं यकीन ही नहीं कर पा रहा था, इतना जिंदादिल इंसान खुद को कैसे मार सकता है, किन परिस्थितियों में उसने ऐसा किया, आखिर क्यों मुझे उससे बात करने में देरी हो गई, मैं खुद को भी कोस रहा था।
मेरे भाई भूपेंद्र ने शादी नही की थी मैं बार बार इस बात के लिए उसे दबाव डालता रहा पर उसने कभी घर बसाने का नहीं सोंचा!

हमारे ऑफिस के दिनों में उसे एक लड़की से प्यार हुआ था, मैं इसका साक्षी रहा, लड़की बहुत समझदार थी उसने अपने माता पिता को मनाने की कोशिश की फिर अंतर्जाति संबंध को स्वीकृति नहीं मिलने पर दोनों अलग हो गए, शायद यह बात उसे लग गई थी या फिर उसके मन से वह प्रेम कभी निकल ही नही पाया!
मैं जब भी मिलता उसे शादी के लिए कहता वह टाल देता, शराब पीने लगा था, मैं इस बात के लिए उससे लड़ता पर कोई असर नहीं हुआ।
एक दिन उसने बताया गांव में सरपंच का चुनाव लड़ रहा है, मुझे खुशी हुई, वह जीत भी गया, हमने सेलिब्रेट भी किया, लगा अब उसकी पटरी बदलेगी, बदली पर उसमें एल्कोहल और ज्यादा था, हमारा मिलना जुलना कम हो रहा था, मैं अपनी फिल्मों और पत्रकारिता में व्यस्त होते चला गया, अब कई कई साल बात नही होते थे, खबर मिलती थी, एक दिन उसका कॉल आया बस से उतरते गिर गया सर पे चोंट आई है, मैंने एक परिचित अस्पताल में उसको इलाज के लिए भेजा ठीक हो गया।
पवन चंद्राकर भईया से मिलता तो भूपेंद्र की ही बात करते, अभी 6 महीने पहले योजना बनी थी, गिरी साहब से मिलने जाएंगे धमतरी, सब ने हामी भरी, मेरी कार में हम चार झन जाने वाले थे पर फिर से यह योजना सफल नहीं हो सकी।

आज भूपेंद्र के अवसान की खबर उन्ही से मिली जिनसे पहला परिचय भूपेंद्र ने ही कभी कराया था, बहन ऋचा वर्मा, भूपेंद्र की भाभी हैं, कभी भूपेंद्र ने सेना के सिलसिले में ऋचा से बात कराई थी आज उसने मुझे मेरे यार के मरने की खबर दी, मन खराब, बहुत खराब है, तेज हवा चल रही है, तूफान उमड़ रहा है, रास्ते की दूरी भर मैं बीते दिनों को जीते गांव पहुंचा।
सीधे शमशान की ओर मेरी कार बढ़ रही थी और धड़कने भी!
कैसे देख पाऊंगा यार तेरा चेहरा, साथ हंसते, खिलखिलाते जिये थे, मुझे उसकी मुस्कुराहट याद आ रही थी, हिम्मत करके आखिर चेहरा देख ही लिया मैंने, यूं के उठ खड़ा होगा अभी, गज्जू भाई मेरी याद नही आती तुझे, बड़ा फिल्म लेखक बना फिरता है साले!
आंसुओं ने आपा खो दिया था, चेहरे तक लकीर बनाने लगी, जिसे मैं लोगों से छुपा कर पार्थिव देह के सामने एकटक देखते खड़ा रहा।

दोस्त का जाना क्या होता है समझ रहा था और भी साथी आसपास खड़े थे सब चुप, बस आंखें बातें कर रही थी सबका दर्द खामोशी में छुपी, बाहर तेज हवा और तूफान का मंजर, भूपेंद्र आज आखरी बार भौतिक रूप से हमारे साथ था पर निर्जीव और हम उन्हें उसके राख होते तक देख रहे थे।
: गजेंद्ररथ गर्व, खरोरा
