प्रजातंत्र या पार्टीतंत्र!
भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, यह किताबों में पढ़ाया जाता है और शीर्ष नेताओं से लेकर आमजनता तक सभी इस बात से सहमत हैं!
लेकिन जब देश की सत्ता पर राजनीतिक संगठन अपने नियमों के साथ शासन कर रही होती हैं तब यह दावे कितने सही और प्रजातांत्रिक है?
आज हम इसका ही विश्लेषण करेंगे।
आजादी के बाद से भारत में कांग्रेस ने राजपाठ संभाला और एक परिवार विशेष की सत्ता सालों साल कायम रही, अब वर्तमान में बीजेपी के हाथों सत्ता का हस्तांतरण हो चुका है और अभी की परिस्थियों से हम सब वाकिफ हैं।
पार्टी संगठन के हाथों सत्ता का पावर बटन!
देश में मुख्यतः कांग्रेस और बीजेपी ने केंद्र की सत्ता चलाई है और यह संवैधानिक व्यवस्था है की पार्टी संगठन ही सत्ता के लिए अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ राजपाठ करती है पर क्या इस व्यवस्था में चुने हुए प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी प्रजातांत्रिक रूप से निभा पा रहे हैं?
उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार है और यहां के वन संसाधन तेजी से खत्म किए जा रहे हैं, इन क्षेत्रों से चुने हुए प्रतिनिधि पार्टी गाइड लाइन का पालन करते हुए चुप्पी साधे बैठे हैं और जनता उन्हें कोस रही है, कहने का तात्पर्य है यदि उस क्षेत्रीय प्रतिनिधि को जनता ने चुना है तो वह जनता का होना छोड़ कर पार्टी का कैसे हो गया?
यानी पार्टी संगठन का आदेश ही सर्वोपरि फिर जनता का क्या जिन्होंने अपना कीमती वोट देकर जिताया?
आप हम देखते हैं की राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां अपना प्रतिनिधि खुद तय कर देती हैं और उनके चुने हुए चेहरे को हम चुनकर इस भ्रम में रहते हैं की वह हमारा प्रतिनिधि है?
जबकि वह पहले अपने पार्टी का प्रतिनिधि होता है, इसीलिए तो वे जनमत से ज्यादा पार्टी आदेशों का पालन करने वाले होते हैं, इसके कई उदाहरण आप अपने आसपास देख सकते हैं।
पार्टियों की अपनी आइडियोलॉजी होती है और उसी को आधार बना कर वे सत्ता की कमान तक पहुंचते हैं लेकिन जब जनहित पर बात आती है तब पहले यही पार्टियां अपने संगठन को सर्वोपरि बताने लगते हैं।

अब बताइए! छत्तीसगढ़ से उसकी आत्मा यहां के जंगल, नदियों को बेचकर, खत्मकर राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने कौन सा उदाहरण पेश किया है?
और यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है की अगर पार्टियों की विचारधारा देशहित की हैं तो उनमें टकराव क्यों है?
ठीक है प्राकृतिक संसाधनों पर राष्ट्र का अधिकार है पर जब जनमत खिलाफ हो तब तानाशाही क्यों?
आदिवासी बाहुल्य इस प्रदेश में सत्ता का चेहरा आदिवासी को बनाकर लूटने की चालाकी ठीक पंचतंत्र की कहानी जैसी नही लगती?
: गजेंद्ररथ गर्व, संपादक pradeshvad.com
