पाटेश्वर धाम बनाम आदिवासी समाज: छत्तीसगढ़ में आदिम संस्कृति को हिंदुत्व में विलोपित करना चाहती है बीजेपी?

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पाटेश्वर धाम बनाम आदिवासी समाज: छत्तीसगढ़ में आदिम संस्कृति को हिंदुत्व में विलोपित करना चाहती है बीजेपी?

छत्तीसगढ़ मूल आदिवासियों का प्रदेश है, मुख्यमंत्री आदिवासी विष्णुदेव साय हैं और अभी प्रदेश के बालोद में स्थित आस्था केंद्र पाटेश्वर धाम विवाद का केंद्र है।

इसी बीच प्रदेश की बहुसंख्य कुर्मी और तेली समाज ने यहां कार्यक्रम आयोजित किया है, क्या यह कार्यक्रम सत्ता प्रायोजित है, आखिर क्या संदेश छुपा है इन आयोजनों में?

क्या छत्तीसगढ़ की बहुसंख्य समाज आदिवासी विरोधी है? क्यों आदिम जनजाति समाज के आस्था केंद्रों पर कब्जा किया जा रहा है, क्या यह भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी बिसात है?

आदिवासियों के पक्ष में जिस पाटेश्वर धाम की लड़ाई लड़ते तत्कालीन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना प्रमुख अमित बघेल जेल जा चुके हैं अब उसी आस्था केंद्र पर कुर्मी समाज ने कार्यक्रम आयोजित किया, तेली समाज ने कार्यक्रम के लिए पत्र जारी किया है, आखिर क्यों अचानक इन समाज विशेष द्वारा आदिवासियों के देवताओं पर उनके प्राचीन आस्था स्थलों पर अधिकार जमाने जैसे प्रयास किए जा रहें?

एक ओर कुर्मी समाज के अगुवा, सांसद विजय बघेल पाटेश्वर धाम में प्रदेश स्तरीय सम्मेलन करते हैं जहां जामड़ी पाट को माता कौशल्या धाम बता रहें जबकि अभी कुछ दिन पहले शंकराचार्य स्वामी रामभद्राचार्य महराज ने सिरे से खारिज किया की माता कौशल्या का इस क्षेत्र से कोई नाता रहा हो, ऐसे में क्या चंद्रखूरी और जामड़ी पाट मनगढ़ंत कौशल्या धाम है?

छत्तीसगढ़ आदिम धरा है जहां कुर्मी और तेलियों की आमद क्षत्रपति शिवाजी के शासन काल के समय को माना जाता है लेकिन वर्तमान में जिस तरह आदिवासी समाज के देव ठानों को हिंदू आस्था केंद्र बता कर विवाद पैदा किया जा रहा हैं बहुत ही चिंता का विषय है।

बालोद के जामड़ी पाट का इतिहास आदिम जनजाति समाज से जुड़ा है, भले ही अब बलि प्रथा जैसी परंपराओं को बंद करना अच्छा बदलाव है लेकिन आदिम संस्कृति को मूल रूप से बदलने का प्रयास आदिवासी समाज को पीछे धकेलने जैसा है।

अब से कुछ साल पहले भी जब प्रदेश की सबसे बड़ी गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना ने आदिवासियों के समर्थन में पाटेश्वर धाम पर बाबा बालक राम दास का विरोध किया था और आदिम संस्कृति के पक्ष में आंदोलन किया तब भी प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई की और अमित बघेल सहित लगभग डेढ़ सौ सेनानी जेल के सलाखों के पीछे धकेल दिए गए थे।

आदिवासी समाज शुरू से जामड़ी पाट के मामले में अपने आस्था केंद्र पर जबरिया कब्जा का आरोप लगाते रहे है,  जिस बाबा रामदास पर आरोप लगे वे खुद कुर्मी समाज से आते हैं, ऐसे में सोचने वाली बात है की आखिर जब यह प्राकृतिक क्षेत्र आदिवासियों का पाट क्षेत्र है तो अन्य समाज क्यों उनके हितों पर डाका डाल रहे हैं?

अब साहू समाज ने भी इस क्षेत्र में आयोजन की रूपरेखा बनाई है तो क्या यह सत्तासीन बीजेपी का हिंदुत्व स्थापना अभियान माना जाए, ऐसे में आदिवासियों की आस्था का क्या?

छत्तीसगढ़ में सभी आस्था केंद्र आदिवासियों के सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हैं, इसी परिपेक्ष्य में जहां अमित बघेल बुढ़ादेव के स्वरूप सल्ला गागरा को राजधानी रायपुर के बुढ़ा तालाब में स्थापित करने अभियान चलाते हैं, प्रदेशभर से कांसा दान मांगा जाता है वहीं उनका ही समाज दूसरी ओर आदिम चिन्हों को परिवर्तित करने सत्ता संग लामबंद है?

आखिर आदिवासियों के इस प्रदेश में उनकी क्या कीमत है? इस प्रदेश के मूल को अपने पूजा पद्धति के लिए लड़ना पड़े, अधिकार मांगने आंदोलन करना पड़े तो कैसा उनका प्रदेश और कैसा न्याय है?

अभी डोंगरगढ़ में आदि शक्ति समलाई का बलि विवाद चर्चा में है और अब जामड़ी पाट का मामला क्या सरकार भी आदिवासियों के खिलाफ है?

छत्तीसगढ़ में हिंदुत्व का बड़ा चेहरा तेली और कुर्मी समाज है बहुप्राय इन्ही समाजों से सर्वाधिक लोग भारतीय जनता पार्टी के सदस्य और सांसद, विधायक है तो क्या बीजेपी इन्हें इस्तेमाल करके आदिम प्रदेश छत्तीसगढ़ में हिंदुत्व स्थापना का महाअभियान चला रही है? या फिर प्रदेश के रसूखदार लोग समाज और सत्ता के आड़ में प्रदेश के मिनरल्स पर आधिपत्य जमाने कोई खेल रच रहे हैं?

छत्तीसगढ़ में जिस रफ्तार से आदिवासियों को खत्म किया जा रहा है और वे खामोश हैं ऐसे में छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया शब्द सिर्फ इन्ही के लिए लागू हो रहा बाकी अन्य छत्तीसगढ़िया समाज तो इन्हीं भोले भाले आदिवासी समाज के सर पर बैठा राजनीति का गुदुम बजा रहे हैं।

यह समय आदिम संस्कृति के उत्थान का होना चाहिए न कि उन्हें खत्म करने का और इस काम में सभी समाज आदिवासियों का साथ दें न की उन्हें पंक्ति विहीन करें, इस समाज ने अपने ही प्रदेश में बहुत कुछ सहा है, नक्सल का नासूर अभी अभी भरा है, इनके आंख से आंसू पोछने के बजाय कहीं इन्हें दुत्कारा गया, देव स्थलों से खदेड़ा गया तो यह प्रदेश के सभी आयातित समाजों के लिए अहसान फरामोशी होगी।

आलेख: गजेंद्ररथ गर्व, प्रदेश अध्यक्ष, छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ, छत्तीसगढ़ 9827909433

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