एक दिन जब मैं बहुत भूखा था…कसम खा ली!
माया नगरी में एक लेखक का संघर्ष सबसे ज्यादा होता है!
2005 मुंबई में अपने लिए जगह तलाश रहा था, हर दिन सुबह उम्मीद से निकलता, शाम को नाउम्मीदी लेकर लौटता और रात में फिर से उम्मीद वाली सुबह का सपना संजोए सो जाता, जितनी नींद आती उसमें सपने कम ही आते!
वीरा देसाई रोड पर एक होटल की टेबल में मैं कुछ खाने की गरज से बैठा पर उस दिन मैंने एक कसम खाई कि अब अपनी जमीन पर अपने लोगों के साथ, अपनी भाषाई अस्मिता और पारंपरिक पहचान की ऐसी मशाल जलाऊंगा की बस ये जन्म सफल हो जाए!
पुणे में पढ़ाई के दौरान क्षेत्रीयता की जो धमक मैंने देखी मुझे लगा मेरे राज्य में इसकी बहुत जरूरत है, सच में मैं और मेरे जैसे मेरे प्रदेशवासियों के मन में अपनी अस्मिताई ताकत को पहचानने का नजरिया ही नहीं था और जितना था उतना शायद काफी नहीं था!
छत्तीसगढ़ पृथक राज्य निर्माण को चार साल बीत रहे थे और मैं अपनी जन्मभूमि से कोसो दूर सागर किनारे महाराष्ट्र की धड़कन मुंबई में अपनी जिंदगी तलाश रहा था।
बाबूजी एक अच्छे लेखक थे, वे फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखा करते पर कभी मुंबई जाने की जिद नहीं ठानी लेकिन मेरे लिए उनके मन में बड़े सपने थे और हर शाम उन सपनों पर परिचर्चा भी हम बाप बेटे कर ही लेते थे!
हां तो मैं वीरा देसाई रोड की होटल में था, वेटर को आवाज लगाई वह आया तो जैसे मेरी आदत थी पहले छत्तीसगढ़ी में अउ सब बने बने पूछ लिया, अरे बाप रे घोर आश्चर्य वेटर ने छत्तीसगढ़ ले आए हस का भइया पूछा तो लगा उसे गले लगाकर रो लूं!
हां भाई तहुं हस का? मैंने तपाक से पूछा, बलौदा चांपा के हंव भैया कहते हुए वह भी खुश दिख रहा था!
परदेश में अपने राज्य का कोई मिल जाए तो यूं लगता है जैसे बहुत करीबी रिश्तेदार मिल गया।
वहीं पास की टेबल पर कुछ और लोग बैठे थे जो मराठी में गीटपीटिया रहे थे, मुझे मराठी भाषा बहुत अच्छी लगती है, हर नई भाषा मुझे आकर्षित करती है शायद इसलिए मैं बहुत सी भाषाओं को सीखता आगे बढ़ा!
यहां कैसे? मैंने उस अनजान दोस्त से पूछा जिसे अभी अभी जाना और बहुत करीबी महसूस कर रहा था, कुछ नहीं भैया बस घर से भाग कर आ गया था और अब यहीं का हो गया हूं पांच साल गुजर चुके कहते हुए संतोष डबडबा सा गया था, मां बचपन में छोड़ गई सौतेली मां ने तंग किया तो घर से भाग आया पर अब घर जाता हूं सबसे अच्छे रिश्ते हैं, सौतेली बहन, भाई हैं उनके लिए पैसे जोड़ता हूं अभी गांव में घर बनवा रहा कहते हुए संतोष की आँखें चमक रही थी।
आप यहां कैसे, पढ़ने आए हो? पूछते हुए संतोष ने प्लेट लगाई, नहीं यार पढ़ाई तो पुणे में पूरी हो गई अब काम की तलाश में हूं भाई!
कैसा काम करोगे पूछते हुए संतोष शायद मेरी मदद करना चाहता था, मैं फिल्में लिखता हूं!
इतना सुन वह एक टक मुझे देखता रहा और बोला ज्यादातर लोग यहां एक्टिंग करने, हीरो बनने आते हैं आप लिखने की बात कह रहे हो?
हां यार मैं राइटर हूं कहते हुए रोटी का टुकड़ा दाल की कटोरी में डुबाने लगा।
संतोष पास ही खड़ा रहा और हमारी बातें जारी रही इस बीच उसने कहा, भैया आपको छत्तीसगढ़ी फिल्म बनानी चाहिए यहां शायद आपको बहुत समय लगे लेकिन अपनी मिट्टी में उगने का अवसर जल्दी मिलता है, मैंने उसे एक टक देखा और हां में सर हिला दिया, उस रात मुझे नींद नहीं आई मैं लगातार अपने प्यारे छत्तीसगढ़ को, अपने मां बाबूजी और खरोरा के अपने सहपाठियों, साथियों को याद करता रहा।
मैंने ठान लिया था, संतोष की बात मैं जरूर मानूंगा, सच में जिस मिट्टी ने जन्म दिया उस मिट्टी की प्रकृति ही मेरी प्रकृति है, जिस भाषा ने मुझे संवेदनाएं सिखाई वही भाषा मेरी अभिव्यक्ति की भाषा है, मेरी लेखनी की भाषा और मेरी जिंदगी की भाषा अब छत्तीसगढ़ी होगी, उस रात की सुबह मैं देर से जागा, उस दिन का जागना मेरे लिए बड़ी सीख बन गई।
बतौर फिल्म लेखक और निर्माता 2008 में हमारी पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बैर रिलीज हुई, एकदम मौलिक, अखाड़ा परंपरा पर आधारित और ग्रामीण जीवन की कहानी, हंसाती गुदगुदाती एक मार्मिक फिल्म भी कह सकते हैं, मैंने संतोष को बताया था, वह बहुत खुश हुआ, मैंने उसे धन्यवाद किया और वापस लौट कर आने की बात कही पर शायद उसे मुंबई जम गई थी!
प्रादेशिक अस्मिता की आग ने मेरे जीवन को बदल दिया था, मैं लगातार छत्तीसगढ़ी को लेकर मुखर रहा और तभी 2012-13 में IBC24 ने मेरी मुखरता को मंच दिया, लगातार 10 साल हमरबानी हमरगोठ, छत्तीसगढ़ के रंग, पुरखा के सुरता, पंचायती, मोर माटी के नाचा सहित कई छत्तीसगढ़ी प्रोग्राम संपादन करते हुए प्रादेशिकता की बुलंद आवाज बनकर मैंने छत्तीसगढ़ी की ताकत को साबित करने वाली तमाम कार्यक्रम प्रसारित किए, यहां तक कि प्रादेशिक फिल्मों को भी प्रमोशन का मंच देने लगातार सफल कोशिश करता रहा और फिर बारी आई प्रदेश की सबसे बड़ी गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना संग जुड़ कर छत्तीसगढ़िया अस्मिता की आवाज गांव गली चौराहे तक पहुंचाने की वर्ष 2016-17 से अनवरत यह यात्रा अंतिम सांस तक जारी रहने वाली है, पता नहीं कितना सफल हो पाये लेकिन शायद कुछ बदलाव तो जरूर आया है?
इस सफर ने बहुत कुछ दिखाया, सिखाया और आगे बढ़ने का जस्बा दिया, सबसे बड़ी ताकत आप सभी सोशल मीडिया के साथी रहे जिन्होंने लगातार मुझे अपने लक्ष्य को पाने उर्जित किया।
धन्यवाद आप सभी साथियों का…जय छत्तीसगढ़
Gajendra Rath Verma ‘GRV’ 9827909433
