लगातार वर्षा के बीच धान फसल में रोग एवं कीटों का बढ़ा खतरा, वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने की सलाह
रायपुर, 6 अगस्त। छत्तीसगढ़ में लगातार हो रही वर्षा, अधिक आर्द्रता तथा खेतों में लंबे समय तक नमी बने रहने के कारण धान की फसल में जीवाणु एवं फफूंदजनित रोगों तथा विभिन्न कीटों के प्रकोप की आशंका बढ़ गई है। वर्तमान में अधिकांश क्षेत्रों में धान की फसल रोपाई के बाद प्रारंभिक वृद्धि अवस्था में है, जो विशेष रूप से जीवाणु झुलसा (बैक्टीरियल ब्लाइट) रोग के प्रति अत्यधिक संवेदनशील मानी जाती है। इन परिस्थितियों को देखते हुए आईसीएआर–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान ने किसानों के लिए विशेष वैज्ञानिक परामर्श जारी किया है।
संस्थान के निदेशक डॉ. पी. के. राय ने किसानों से अपील की है कि वे खेतों का नियमित निरीक्षण करें तथा मौसम की परिस्थितियों को देखते हुए समय पर वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाएं। उन्होंने कहा कि समय रहते रोग एवं कीटों की पहचान, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन तथा अनुशंसित कृषि रसायनों का विवेकपूर्ण उपयोग ही संभावित फसल हानि को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय है।
संस्थान के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. कल्याण कुमार मंडल ने बताया कि वर्तमान मौसम जीवाणु झुलसा (Bacterial Blight) के प्रसार के लिए अत्यंत अनुकूल है। यह रोग Xanthomonas oryzae pv. oryzae नामक जीवाणु से होता है। किसानों को पत्तियों के किनारों या सिरों से नीचे की ओर बढ़ने वाले पानी से भीगे धब्बे, पत्तियों का पीला पड़ना एवं सूखना तथा रोपाई के बाद पौधों के अचानक मुरझाने जैसे लक्षण दिखाई देने पर तत्काल आवश्यक प्रबंधन अपनाने की सलाह दी गई है।
परामर्श में जीवाणु झुलसा की रोकथाम के लिए रोपाई के सात दिनों के भीतर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के छिड़काव की अनुशंसा की गई है। रोग के लक्षण दिखाई देने पर ही स्ट्रेप्टोसाइक्लिन अथवा अनुशंसित क्षेत्रों में ऑक्सोलिनिक अम्ल का सीमित एवं विवेकपूर्ण उपयोग करने की सलाह दी गई है। संस्थान ने एंटीबायोटिक के अनावश्यक एवं बार-बार प्रयोग से बचने पर विशेष बल दिया है, जिससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की समस्या को रोका जा सके।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लगातार वर्षा के कारण शीथ ब्लाइट, लीफ ब्लास्ट, ब्राउन स्पॉट, फॉल्स स्मट जैसे फफूंदजनित रोगों की संभावना भी बढ़ सकती है। ऐसे में प्रारंभिक लक्षण दिखाई देने पर मैनकोजेब, टेबुकोनाजोल अथवा ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन + टेबुकोनाजोल (नेटिवो) जैसे अनुशंसित फफूंदनाशियों का उपयोग करने की सलाह दी गई है।
इसके साथ ही किसानों को तना छेदक, पत्ती मोड़क, भूरा फुदका, गॉल मिज एवं राइस हिस्पा की नियमित निगरानी करने तथा केवल आर्थिक क्षति स्तर (ETL) पार होने पर ही इमिडाक्लोप्रिड, बुप्रोफेज़िन अथवा क्लोरैन्ट्रानिलिप्रोल जैसे अनुशंसित कीटनाशियों का प्रयोग करने की सलाह दी गई है।
आईसीएआर–एनआईबीएसएम ने किसानों को सप्ताह में कम से कम दो बार खेतों का निरीक्षण करने, खेतों में जल निकासी की समुचित व्यवस्था बनाए रखने, नत्रजन उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने, पोटाश की पर्याप्त मात्रा देने तथा केवल प्रमाणित एवं गुणवत्तायुक्त कृषि रसायनों का ही लेबल निर्देशानुसार उपयोग करने की सलाह दी है। संस्थान ने कहा है कि वर्तमान मौसम में समय पर रोग एवं कीटों की पहचान, नियमित फसल निगरानी तथा वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण प्रबंधन अपनाकर धान की फसल को संभावित नुकसान से प्रभावी रूप से सुरक्षित रखा जा सकता है।
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