राज्यसभा में मंगलवार दोपहर विपक्षी दलों के भारी हंगामे और नारेबाजी के बीच ‘जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026’ को ध्वनि मत से पारित हो गया। पिछले हफ्ते लोकसभा की मुहर लगने के बाद अब इस बिल को संसद की पूरी मंजूरी मिल गई है। बिल पास होते ही भारी शोर-शराबे के कारण सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय द्वारा पेश किए गए इस नए विधेयक का मुख्य मकसद देश में जन्म और मृत्यु के रजिस्ट्रेशन से जुड़े पुराने नियमों को सख्त बनाना है। सरकार का मानना है कि फर्जी दस्तावेज और देर से होने वाले रजिस्ट्रेशन के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए कानूनों को मजबूत करना बहुत जरूरी हो गया था।
देरी से रजिस्ट्रेशन पर अब सख्त हुए नियम
इस नए कानून के लागू होने के बाद अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे के जन्म या किसी व्यक्ति की मृत्यु के 2 साल बाद रजिस्ट्रेशन कराने पहुंचता है, तो उसे अब सीधे अधिकारियों के चक्कर काटने से राहत नहीं मिलेगी। दो साल से अधिक की देरी वाले मामलों में अब फर्स्ट क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट का लिखित आदेश अनिवार्य कर दिया गया है।
पुराने नियम (1969 अधिनियम) के तहत 1 साल से ज्यादा की देरी होने पर जिलाधिकारी (DM), एसडीएम (SDM) या किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश से काम चल जाता था। अब नए संशोधित कानून में 2 साल तक की देरी के लिए तो पुराना नियम लागू रहेगा, लेकिन 2 साल से ज्यादा समय बीत जाने पर अब अदालत के न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश लेना ही पड़ेगा।
सदन में भारी हंगामा और गृह मंत्री की गैरमौजूदगी पर सवाल
विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खर्गे ने मांग रखी कि सदन का कामकाज तभी ठीक से चल सकता है जब प्रधानमंत्री खुद सदन में मौजूद हों। हालांकि, उपसभापति हरिवंश ने उन्हें रोकते हुए बिल पर चर्चा आगे बढ़ाई। इसके साथ ही विपक्षी सांसदों ने गृह मंत्री की गैरमौजूदगी पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतना महत्वपूर्ण बिल गृह मंत्री को खुद सदन में पेश करना चाहिए था।
विपक्ष के कई अन्य सांसदों ने भी बिल के कुछ प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई। यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी (लिबरल) के सांसद प्रमोद बोरो और शिवसेना की ज्योति नागनाथ वाघमारे ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जाने वाली शर्त का विरोध किया। बोरो ने तर्क दिया कि देश में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेटों के पास पहले से ही मुकदमों का काफी बोझ है, ऐसे में आम जनता को जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में और ज्यादा देर होगी।
आम जनता की सहूलियत और सही आंकड़ों की मांग
शिवसेना सांसद वाघमारे ने सुझाव दिया कि सरकार को प्रक्रिया को सख्त और जटिल बनाने के बजाय आसान बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जुर्माने और अदालती प्रक्रिया की जगह घर-घर जाकर या विशेष कैंप लगाकर लोगों का पंजीकरण आसान किया जाना चाहिए। वहीं, सीपीआई (एम) के सांसद वी. शिवदासन ने कहा कि कागजों में लीपापोती के बजाय मृत्यु के सही कारणों, जैसे कुपोषण या अन्य बीमारियों को रिकॉर्ड में पारदर्शी तरीके से दर्ज किया जाना चाहिए।
सदन में अपना पहला भाषण दे रहे बीजेपी सांसद बिस्वजीत सिन्हा ने सरकार के इस कदम का जोरदार समर्थन किया। उन्होंने विपक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि कुछ दल इस सख्त बिल का विरोध इसलिए कर रहे हैं ताकि बांग्लादेशी और पाकिस्तानी नागरिकों का आसानी से भारतीय दस्तावेजों में पंजीकरण कराया जा सके।
फर्जीवाड़े और घुसपैठ रोकने के लिए जरूरी कदम: सरकार
तमाम सवालों और चर्चा का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने स्पष्ट किया कि देरी से होने वाले पंजीकरण, विशेषकर 2 साल से अधिक पुराने मामलों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा था। कई जगहों पर फर्जी मतदाता पहचान पत्र बनाने और दूसरे देशों में जन्मे बच्चों का अवैध रूप से भारतीय राज्यों में रजिस्ट्रेशन कराने के मामले सामने आ रहे थे।
गृह राज्य मंत्री ने सदन को आश्वस्त किया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी की शर्त इसीलिए जोड़ी गई है ताकि फर्जीवाड़े पर पूरी तरह से लगाम लगाई जा सके। सरकार का उद्देश्य नागरिकों को परेशान करना नहीं, बल्कि देश के जन्म-मृत्यु के आधिकारिक रिकॉर्ड को पूरी तरह सुरक्षित, पारदर्शी और सटीक बनाना है।
