रसोई गैस सिलेंडर नही मिल रहें? पुरुषों के लिए बड़ी चुनौती!

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रसोई गैस सिलेंडर नही मिल रहें?
पुरुषों के लिए बड़ी चुनौती!

अक्सर महिलाएं कहती हैं, मैं घर का सब काम कर दूंगी लेकिन सामान लाना आपकी जिम्मेदारी।
और अब यही जिम्मेदारी पुरुषों को बड़ी महंगी पड़ रही है, महंगी कैसे? पैसे से नहीं व्यवस्था से!
अरे भाई आखिर सिलेंडर लाएं तो लाएं कहां से?
एजेंसी वाला फोन रिसीव नहीं करता, जाओ तो लंबी लाइन लगी है।
लोग अर्ली मॉर्निंग सब कुछ छोड़कर गैस एजेंसी के सामने बैठे हैं, ऐसा शायद पहले कभी नहीं हुआ था और इसलिए घर के पुरुषों के लिए यह पहला अनुभव है जो उन्हें हलकान होना पड़ रहा है!
बेचारी महिलाएं करें तो करें क्या? घर में सब कुछ है लेकिन ईंधन नहीं, अब खाना बनाए तो कैसे?
आखिर बिजली वाले पतीले से कब तक खाना बना पाएंगे, क्या उन्हें गोबर के कंडे की व्यवस्था करनी पड़ेगी या फिर लकड़ी खरीदनी पड़ेगी, लेकिन खरीदें तो खरीदें कहां से?
कहां मिलेगा कैसे मिलेगा?
हे भगवान खाना बनेगा कैसे?

और लगभग शहरी, कस्बाई और गांव में भी यह घर-घर की कहानी हो चुकी है!
गैस सिलेंडर नहीं है, खाना कैसे बनेगा?
इस पीढ़ी की महिलाओं ने तो चूल्हे पर खाना बनाया ही नहीं! तब तो और भी परेशानी हे! भगवान आखिर यह कब तक चलेगा?
सरकार तो इसे शुरुआत बता रही है और अगर यह शुरुआत है तो आगे क्या होगा?
दो देश लड़ रहे हैं और भारत के घरों में खाना नहीं बन रहा है उनकी लड़ाई हम भूखे पेट झेल रहे हैं, रास्तों में, एजेंसियों पर दोस्तों के पास सिलेंडर मांगने जा रहे हैं और किसी के पास हो तो देना किसके पास मिलेगा?

भाई किसी के पास है और है तो आपको क्यों देगा जब सरकार ही कह रही है की आने वाले दिनों में संकट और बढ़ेंगे!
तो कौन भला आपको अपना रिजर्व सिलेंडर देगा?

और अभी तो रुकिए डीजल पेट्रोल के लिए भी मारामारी शुरू हुई हो ही रही है फिर तो आप साइकिल पर आ जाएंगे!
हां जिनके पास इलेक्ट्रिक बाइक और कारें हैं उनका कुछ दिन चल पाएगा लेकिन कब तक भला?
परेशानियां आती नहीं है हम निमंत्रण देकर बुलाते हैं और यह परेशानी किसने बुलाया है जरा पता लगाइए?
कहीं यह विश्व के सबसे बड़े बाजार भारत को अस्थिर करने की साज़िश तो नही?

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