लगातार वर्षा के दौरान धान की फसल की नियमित निगरानी एवं वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाएं किसान: एनआईबीएसएम
रायपुर, 5 अगस्त, 2026 छत्तीसगढ़ में खरीफ मौसम के दौरान धान की रोपाई को लगभग 15–20 दिन हो चुके हैं। अधिकांश क्षेत्रों में लगातार हो रही वर्षा के कारण धान की फसल अच्छी वृद्धि अवस्था में है, लेकिन उच्च आर्द्रता एवं जलभराव की परिस्थितियां कई प्रमुख कीटों एवं रोगों के विकास के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार करती हैं। ऐसे में किसानों को फसल की नियमित निगरानी, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, उचित जल निकासी तथा समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। यह सलाह आईसीएआर–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान (आईसीएआर-एनआईबीएसएम),रायपुर द्वारा किसानों के हित में जारी की गई है।
संस्थान के निदेशक डॉ. पी. के. राय ने कहा कि धान की प्रारंभिक वृद्धि अवस्था भविष्य की उपज निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान मौसम में खेतों में 2–5 सेंटीमीटर तक जल स्तर बनाए रखें तथा जहां आवश्यकता हो, वहां अतिरिक्त पानी की शीघ्र निकासी सुनिश्चित करें। खेतों का नियमित निरीक्षण कर कीट एवं रोगों के प्रारंभिक लक्षणों की पहचान करने से समय रहते प्रभावी नियंत्रण संभव है तथा अनावश्यक रासायनिक छिड़काव से भी बचा जा सकता है।

संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने बताया कि रोपाई के 15–20 दिन बाद खरपतवार नियंत्रण, संतुलित उर्वरक प्रबंधन तथा खेतों की नियमित निगरानी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग केवल उपयुक्त मौसम में करें तथा लगातार वर्षा के दौरान उर्वरकों के उपयोग से बचें। उन्होंने कहा कि किसी भी कीटनाशक का प्रयोग आर्थिक क्षति स्तर के आधार पर तथा कृषि वैज्ञानिकों की अनुशंसा के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार वर्तमान मौसम में तना छेदक व पत्ती मोड़क के प्रकोप की संभावना बढ़ जाती है। किसानों को सप्ताह में कम-से-कम एक बार खेत का निरीक्षण करना चाहिए तथा प्रभावित पौधों एवं पत्तियों को नष्ट करना चाहिए। फैरोमॉन ट्रैप व लाइट ट्रैप का उपयोग करें । आवश्यकता पड़ने पर केवल अनुशंसित कीटनाशकों का ही प्रयोग करें, जिससे मित्र कीटों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।
लगातार वर्षा एवं अधिक आर्द्रता के कारण शीथ ब्लाइट, जीवाणु झुलसा तथा पत्ती झुलसा जैसे रोगों के संक्रमण की संभावना भी बढ़ जाती है साथ ही जिंक की कमी के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। इनकी रोकथाम के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, उचित जल निकासी तथा नियमित निगरानी आवश्यक है। रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देने पर किसानों को तुरंत कृषि वैज्ञानिकों अथवा कृषि विभाग के विशेषज्ञों से संपर्क कर अनुशंसित फफूंदनाशी अथवा जीवाणुनाशी का ही प्रयोग करना चाहिए।

संस्थान ने किसानों से अपील की है कि वे मौसम आधारित कृषि परामर्श का पालन करें, बिना आवश्यकता रासायनिक कीटनाशकों एवं फफूंदनाशकों का उपयोग न करें तथा किसी भी असामान्य कीट अथवा रोग प्रकोप की जानकारी निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र , कृषि विभाग अथवा संस्थान के वैज्ञानिकों को दें। वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन तथा संतुलित पोषण एवं जल प्रबंधन अपनाकर धान की फसल को सुरक्षित रखते हुए बेहतर उत्पादन एवं अधिक आय सुनिश्चित की जा सकती है।
