फायर, कायर और सिस्टम!
परिपेक्ष्य: भरत तिवारी एनकाउंटर!
देश की परिस्थियाँ कहीं छुपी नहीं है, अपराध और अपराधियों के लिए उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर की अन्य राज्यों में वकालत लगातार होती रही है, इस बात से बेखबर की यह किसी के लिए बदले का हथियार भी बन सकता है?
अक्सर हम मुंबईया फिल्मों में देखते हैं की सिस्टम की गंदगी साफ करने एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट आता है और किस तरह वह एनकाउंटर कॉप सफेदपोश अपराधियों के लिए एक हथियार साबित होता है, अपने माफिया दुश्मनों के लिए और समाज में ऐसे लोगों के खिलाफ जो दूसरों की आवाज उठाते हैं।
उत्तर प्रदेश हमेशा से भारत का चर्चित राज्य रहा है, भरत तिवारी एनकाउंटर अभी सोशल मीडिया की सनसनी बनी हुई है, लोगों का प्रेम उसकी मौत के बाद उसे शहीद भगत सिंह बना रही है!
एक नौजवान युवा जोश के साथ अपने लोगों के लिए लड़ते लड़ते फायर हो जाता है और पुलिस प्रशासन उसका शिकार कर लेती है।
समाज और कथित बुद्धिजीविता कभी किसी फायर को बर्दास्त नही करती, लोगों को बदलाव चाहिए पर उसी के बीच का कोई बदलाव का श्रेय न ले ऐसा भी दुख पालने वाली जनता को खेल में सिर्फ मजा आता है?
भरत तिवारी के साथ पुलिस प्रशासन घंटों खेलती रही पूरा गांव देखता रहा, वीडियो बनाता रहा पर जिनके लिए भरत ने जान दे दी उनमें से कोई संगठित हो कर उसे बचाने नही आया, आखिर भरत ने इन्ही गांव वालों के लिए ही किया था।
यह सिर्फ एक यूपी की स्थिति नही है तमाम प्रदेश और दुनिया भर के लोगों की मानसिकता है जो अपने बीच से पैदा हुए क्रांतिकारी को उज्जट मान कर अनदेखा करती है बाद में उसके मौत का मातम मनाती है?
खनिज संपदा के मामले में देश का सबसे धनी राज्य छत्तीसगढ़ भी आजकल इन्ही परिस्थितियों से परेशान है, यहां की जनता क्रांति चाहती है पर अपने बीच के क्रांतिकारियों को नकारती है और बदलाव का राग भी गाती है।
गुलाम भारत ने शहीद भगत सिंह को खोया वह मजबूरी थी, तब हम गुलामी की जंजीरों में जकड़े थे, अब कैसी मजबूरी?
राजनीति और क्रांति में फर्क रफ्तार का है, राजनीतिक बदलाव की गति बहुत कम और क्रांतिकारी बदलाव बड़ी तेजी से होता है, आज भरत तिवारी को देश का बच्चा बच्चा जान गया यही क्रांति की ताकत है।
छत्तीसगढ़ में जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ी जा रही लेकिन यहां व्याप्त वर्ग, जाति और विचार भेद ने बदलाव की गति धीमी कर रखी है, प्रदेश में सबसे बड़ी गैरराजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना ने जब कमान संभाली थी तब कोई उसके साथ सिर्फ इसलिए नहीं आया क्योंकि वह क्रांति की पक्षधर है, जैसे को तैसा जवाब देने की बात करता है।
अब छोटे छोटे टुकड़ों में लोग बंटे हुए लड़ रहे हैं असल में हमें पहले एकजुटता स्थापित करनी होगी तब जाकर आंदोलन खड़ा होगा वरना देश के कई राज्यों में भरत तिवारी जैसे सैकड़ों युवा क्रांति की राह पर शहीद होते रहेंगे और जनता उनका मातम मनाती रह जायेगी, दूसरी ओर राजनीति और कॉरपोरेट अपना चेहरा बदल बदल कर देश को गुलाम बनाने का खेल खेलते रहेंगे।

आलेख: गजेंद्ररथ गर्व, प्रदेश अध्यक्ष, छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ, छत्तीसगढ़ 9827909433
