थलापति बनाम माटीपुत्र: छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां असफल क्यों?

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छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां असफल क्यों?

तमिलनाडु में एक्टर विजय थालापति की नई पार्टी का पहिली बार में ही सत्ता सिंहासन पाने की चर्चा देश और दुनिया भर में हो रही है, इसी बीच देश की सबसे बड़ी खनिज संसाधन युक्त प्रदेश छत्तीसगढ़ में भी यह चर्चा छिड़ी हुई है की आखिर क्यों इस राज्य में क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां सफल नहीं हो पा रहीं?

स्वाभिमान मंच की बात करें, JCCJ या फिर अब जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी की, किसी दल ने अब तक इस प्रदेश की जनता का नब्ज नही पकड़ा, इसका सबसे बड़ा कारण क्या हो सकता है? तमिलनाडु की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी से इस प्रदेश की राजनीतिक दलों में क्या अंतर है?

पहली बात की छत्तीसगढ़ में जितने भी क्षेत्रीय दल बने सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से छूटे, टूटे या तिरिष्कृत किए नेताओं ने बनाई और उनकी विचारधाराओं में अंतर नहीं दिखता जैसा कि एक्टर विजय की पार्टी में बताया जा रहा है!

छत्तीसगढ़ कहने को आदिवासी बाहुल्य प्रदेश है पर अब यह OBC बहुताय प्रदेश हो चुका है, यहां आसपास के लगभग आठ राज्यों के लोग आकर बसे हुए हैं ऐसे में भाजपा की विचारधारा यहां कारगर है?

राज्य निर्माण के बाद कांग्रेस को मनोनयन सत्ता मिली!तीन साल बाद चुनाव हुए और तब से भाजपा की सरकार छत्तीसगढ़ में सफल होती रही, पंद्रह साल रमन सिंह की सरकार से जन्मी एंटी इनकंबेंसी ने एकबार फिर कांग्रेस को मौका दिया ठीक इससे पहले प्रदेश में छत्तीसगढ़ियावाद पनपी, स्थानीयता, भाषाई अस्मिता और परंपरागत पहचान जैसी तमाम मामलों में आवाज बुलंद करता एक गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना ने आम छत्तीसगढ़िया को बताना शुरू किया की आपके प्रदेश में आपके विशेषाधिकारों का हनन बाहर प्रांत से आए लोग कर रहे हैं और भाजपा इन्हें पोषित कर रही है?

क्योंकि पंद्रह साल से सत्ता भाजपा के पास रही ऐसे में इनकंबेन्सी भी काम कर रही थी और तब कांग्रेस से टूटकर बनी JCCJ ने भी दांव खेला पर छत्तीसगढ़िया वाद का लाभ न ले सकी लेकिन कांग्रेस ने इसे लपका, कहते हैं छत्तीसगढ़िया वाद का पीला चांवल पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ही फेंका था, लोगों में ऐसी चर्चा भी रही की छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना, भूपेश बघेल से ही पोषित होती रही जबकि सेना के मुखिया अमित बघेल भाजपा के पूर्व किसान नेता रहे हैं!

खैर! तब सेना की मदद से कांग्रेस ने तगड़ी जीत दर्ज की इस लिए भाजपा ने हमेशा सेना को कांग्रेस की B टीम ही कहा!

लेकिन अगला चुनाव आते आते CKS ने भी अपनी राजनीतिक पार्टी JCP बना डाली, चुनावी मैदान में उतरे भी लेकिन जल्दबाजी हो गई और जमानत जप्त!

इससे पहले बनी क्षेत्रीय पार्टियों ने तो खाता खोला था उनके विधायक जीते भी, पर JCP के लिए यह बड़ा दुर्भाग्य था, उनके लगभग 32 उम्मीदवारों में किसी ने भी पांच हजार वोट के आंकड़े को पार नही किया बल्कि पार्टी प्रमुख और छत्तीसगढ़िया वाद के सबसे बड़े चेहरे अमित बघेल, अपने गृह विधानसभा से लगभग पांच हजार वोट का ही समर्थन समेट पाये!

इसका बड़ा कारण रहा हमर राज पार्टी, जी हां इस क्षेत्रीय  राजनीतिक दल की बात तो हमने की ही नही!

यह पार्टी भी सेना से ही टूटकर बनी, बल्कि JCP से पहले बनी, छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना ने एक सांस्कृतिक आयोजन सर्व आदिवासी समाज संग मिलकर किया और बूढ़ा देव की मूर्ति बनाने प्रदेश भर से कांसा, पीतल और पंचरत्न मांगे, मिले भी और ठीक चुनाव के पहले बूढ़ा तालाब के पास बड़े आयोजन में प्रदेश भर के लोग शामिल हुए बाद में पता चला आदिवासी समाज ने अपनी खुद की पार्टी हमर राज नाम से पंजीकृत करा ली और चुनाव में उम्मीदवार भी उतार दिए, ऐसे में CKS की दो क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां अस्तित्व में आ गई!

बिखराव यहीं से हुआ और दोनों ही दल कमजोर पड़ गए, कहा जाता है की बीजेपी ने ही आदिवासी समाज के तब के CKS सदस्यों को पोषित किया और उन्हें CKS से अलग करने में कामयाब हो गए थे!

इधर कांग्रेस जिसे अपना मानती थी वह भी अपनी खुद की पार्टी में व्यस्त रही, इसका पूरा फायदा बीजेपी को हुआ और भारी बहुमत से बीजेपी सरकार बनाने सफल हुई।

क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों में नेतृत्व हीनता!

स्वाभिमान मंच, बीजेपी से टूटे ताराचंद साहू जी की पार्टी थी उनकी कार्यशैली जनता को मालूम थी या यूं कहें उनकी योग्यता पर जनता को शंका रही?

यही हाल प्रदेश के सबसे गुणी नेता अजीत जोगी जी की रही!

दर असल छत्तीसगढ़ियों की सबसे बड़ी कमजोरी आज भी यही है की उन्हें अपने लोग कम योग्य लगते हैं और अनजान लोगों की योग्यता वे बिना जाने मान लेते हैं?

यहां तक कि राष्ट्रीय पार्टियों में उच्च स्थान पर स्थापित छत्तीसगढ़िया नेता भी कभी अपने बच्चों या साथियों को अपना उत्तराधिकार नही दे सके, कारण रहा, अपनों को आयोग्य समझने की भूल?

स्थानीय नेताओं में तटस्थता की कमी भी असफलता का कारण बना।

स्थानीय नेताओं ने शुरू से अपना गॉड फादर बाहरी नेताओं को बनाया जिसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा की बड़ा नेता स्थानीय व्यक्ति हो ही नही सकता?

इस मानसिकता से आज भी छत्तीसगढ़िया जनता उबर नहीं पाई, स्थानीय के अपेक्षा बाहरी उम्मीदवार सफल हुए हैं इसके कई उदाहरण हैं, धरसीवां विधानसभा कुर्मी साहू बाहुल्य क्षेत्र है पर भाजपा ने यहां से एक्टर अनुज शर्मा को टिकट दी, चालीस हजार वोटों की बढ़त से महराज जीत भी गए!

बहुत से क्षेत्रों में जातिवाद का जहर भी काम करता है, कुर्मी, तेलियों में आपसी मनमुटाव के चलते भी यह क्षेत्र अल्पसंख्यक और बाहरी उम्मीदवार को झेलता रहा है, इसके अपराधी भी यहां की जनता ही है।

हर क्षेत्रीय पार्टी स्थानीयता की बात करती है जो राजनीतिक सफलता के लिए सही नही?

आज छत्तीसगढ़ में आसपास के लगभग आठ राज्यों से लोग आकर निवास करते हैं, प्रदेश की जीडीपी में उनका बड़ा योगदान है, रायपुर राजधानी और बड़ा शहर भिलाई तो बिल्कुल क्षेत्रियता से इतर मिजाज रखते हैं, लगभग बड़े शहरों का यही हाल है ऐसे में स्थानीयता का नारा यहां नाकारात्मक प्रभाव डालता है!

छत्तीसगढ़ कभी मराठी राजाओं का गढ़ रहा तो कभी बुंदेले हरबोलों के, ऐसे में यहां की संस्कृति मिश्रित ही रही, भाषाई भिन्नता के साथ वैचारिक मतभेद भी सीमा क्षेत्रों में अक्सर पनपते रहें जिसके चलते यह राज्य एक तटस्थ भाव नही बना पाया और हिंदी पट्टी होने के चलते भारतीय जनता पार्टी का गढ़ बनते चला गया अब इस गढ़ को ढहा पाना टेढ़ी खीर है, इसके लिए अब पंद्रह साल वाली एंटी इनकंबेंसी का इंतजार करना पड़ेगा लेकिन फिर उसके बाद कौन?

क्या छत्तीसगढ़ में सिर्फ दो राष्ट्रीय राजनीतिक दल बीजेपी और कांग्रेस ही उलट पलट कर बैटिंग करते रहेंगे?

छत्तीसगढ़ को एक ऐसे व्यक्तित्व की तलाश है जो सब को साध सके, जो बाहरी भीतरी की राजनीति से इतर हो, जिसका भाव माटी प्रेम और जन सरोकार से भरा हो, जिसके मन में भेद, कुटिलता, द्विभाव न हो, जिसे हर वर्ग के लोगों का विश्वास मिले, जिसकी छवि में तेज और मुस्कान में ईश्वरीय आकर्षण हो, जिसे हर कोई अपना मान सके, ऐसा कोई इस प्रदेश में होगा कभी, तभी इस महान प्रदेश में राजनैतिक परिवर्तन की पटकथा लिखी जा सकेगी।

गजेंद्ररथ गर्व, संपादक – प्रदेशवाद 9827909433

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