छत्तीसगढ़: हसदेव अरण्य में फिर से कटेंगे लाखों पेड़…पढ़ें पूरी खबर!

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हसदेव अरण्य में 7 लाख पेड़ो की काटने का नया प्रस्ताव, छत्तीसगढ़ को बर्बाद कर रेगिस्तान में तब्दील करने की दिशा में एक और कदम होगा – छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन

राजस्थान के लिए नहीं बल्कि अदानी की लूट के लिए हसदेव में खनन की अनुमति।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन एवं हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने संयुक्त बयान जारी करते हुए हसदेव अरण्य क्षेत्र में नए कोल ब्लॉक को स्वीकृति दिए जाने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध जताते हुए इसे तत्काल वापस लेने की माँग रखी। आंदोलन ने कहा कि मोदी-साय सरकार ने छत्तीसगढ़ को अदानी के हाथों बेच दिया है। हसदेव का विनाश राजस्थान की बिजली जरूरतों के नाम पर अदानी की लूट के लिए किया जा रहा है।

आगामी दिनांक 8 मई 2026 को केंद्रीय वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (FAC) की बैठक में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित और अदानी के एमडीओ वाली केते एक्सटेंसन कोल ब्लॉक की वन स्वीकृति देने पर विचार होगा। विष्णुदेव साय सरकार पूर्व में ही वन स्वीकृति की अनुशंसा केंद्र को भेज चुकि है।

इस नए खदान में लगभग 7 लाख पेड़ काटे जाएँगे जिससे न सिर्फ़ समृद्ध जंगल-जमीन, जैव विविधता, हसदेव नदी और बांगो जलाशय का विनाश होगा बल्कि छत्तीसगढ़ रेगिस्तान में तब्दील होगा। पूर्व में ही हसदेव अरण्य में राजस्थान की दो खदाने परसा ईस्ट केते बासेन (PEKB) एवं परसा संचालित हैं जिनमे 10630 एकड़ जंगल – जमीन का विनाश कर लगभग 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं।

वर्ष 2026 में दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में भारत 95 शहर शामिल हैं। बढ़ते जलवायु परिवर्तन के करण अल नीनो जैसी आपदा के दुष्प्रभाव और ज़्यादा गंभीर होते जा रहे हैं। तापमान में अत्यधिक वृद्धि, असमय मानसून और अत्यधिक बाढ़ और तूफ़ान में लगातार वृद्धि हो रही है। जलवायु परिवर्तन के स्थानीय प्रभाव सीधे रूप से हमारे यहाँ दिख रहे हैं, अत्यधिक गर्मी के आंकड़ों में छत्तीसगढ़ राजस्थान को भी पीछे छोड़ चुका है इस स्थिति में हसदेव जैसे समृद्ध प्राकृतिक साल के जंगलों का विनाश हमारे लिए आत्मघाटी कदम होगा।

नहीं बचेगा हसदेव – बाँगो जलाशय – भारतीय वन्य जीव संस्थान ने हसदेव की जैव विविधता अध्ययन रिपोर्ट में लिखा है की खनन से हसदेव नदी और बांगो जलाशय का विनाश होगा । बांगो जलाशय छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जलाशय है जिससे लगभग 6 लाख हेक्टेयर कृषि जमीन में सिंचाई होती है। जंगल के काटने से मानव और हाथियों का संघर्ष इतना व्यापक होगा कि भविष्य में इसे सम्हाला नहीं जा सकेगा।

ऐतिहासिक और पुरातात्विक और धार्मिक महत्व के रामगढ़ पर संकट – खदान की वन स्वीकृति देने के लिए वन विभाग और जिला प्रशासन ने लगातार ग़लत और झूठे दस्तावेज कंपनी के पक्ष में जमा किए है। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के रामगढ़ पहाड़ जिसकी दूरी 9 किलोमीटर है उसे जानबूझकर11 किलोमीटर दिखाया गया। वर्तमान में खनन संचालित खदान के कारण रामगढ़ में बड़ी बड़ी दरारें आ चुकि हैं। इस खदान के खुलने से सम्पूर्ण रामगढ़ पहाड़ का विनाश होगा।

आदिवासियों की आजीविका, अस्मिता और संस्कृति पर संकट – प्रस्तावित परियोजना का 98 प्रतिशन क्षेत्र घना वन है जिस पर आसपास के गाँव के हज़ारों परिवारों का निस्तार और लघु वनोपज का संग्रहण होता है । भारतीय वन्य जीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार हसदेव में ग्रामीणों की आय का 70 प्रतिशत हिस्सा जंगलों से आता है। पूर्व में संचालित खदानों से पहले से ही जंगल में भारी कमी आ चुकी है यहँ तक कि आदिवासियों के देव स्थल का भी विनाश किया जा चुका है। वनाधिकार मान्यता कानून के तहत वन अधिकारों की प्रक्रिया भी पूर्ण नहीं की गई है ।

लेमरू हाथी रिजर्व हो जाएगा औचित्यहीन – हसदेव अरण्य के 1995 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को हाथी रिजर्व के लिए अधिसूचित किया गया है ताकि छत्तीसगढ़ में हाथियों के प्राकृतिक रहवास, माइग्रेटरी कॉरिडोर को सुरक्षित करते हुए मानव हाथी द्वंद को कम किया जाए। प्रस्तावित केंते एक्स्टेसन हाथी रिजर्व की सीमा से नजदीक 10 किलोमीटर की परिधि के अंदर है। यदि इस क्षेत्र में भी खनन की अनुमति दी जाती है तो हथियों के आवाजाही का रास्ता पूर्ण रूपसे बंद हो जाएगा जिससे लेमरू रिजर्व का कोई अयोचित्य नहीं रहेगा। वर्तमान संचालित खदानों के आसपास लगातार हाथियों की मौजूदगी बनी रही है।

हसदेव में खनन की स्वीकृति विधानसभा प्रस्ताव की अवमानना है – छत्तीसगढ़ विधानसभा में 26 जुलाई 2022 को सर्व सम्मति से यह संकल्प प्रस्ताव पारित किया गया था कि हसदेव अरण्य के सभी कोल ब्लॉक को निरस्त किया जाए। वर्तमान भाजपा सरकार विधानसभा के उस संकल्प के विरोध में जाकर सिर्फ निजी उद्योगपति अदानी के मुनाफे के लिए इस खदान को अनुमतियाँ जारी कर रही है।
पूर्व कांग्रेस सरकार ने किया था विरोध – केंते एक्सटेंसन कॉल ब्लॉक की वन स्वीकृति और भूमि अधिग्रहण का भूपेश सरकार ने विरोध करते हुए वन स्वीकृति के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया था। यहाँ तक कि पर्यावरणीय जनसुनवाई निरस्त करते हुए परियोजना की भूमि अधिग्रहण के विरोध में कोयला मंत्रालय को आपत्ति प्रेषित की थी परंतु वर्तमान साय सरकार ने पूर्व सरकार के फैसले को बदल दिया।

राजस्थान के लिए नहीं बल्कि अदानी के पॉवर प्लांटों के लिए खोली जा रही है खदान – सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) ने राजस्थान की बिजली जरूरत के संशोधित आकंडे जारी किए हैं जिसके अनुसार राजस्थान में वर्ष 2025- 2026 से 2035-2036 तक 16561 मेगावाट बिजली की जरूरत है जो पूर्व 20532 मेगावाट बताई गई थी. यहाँ तक कि कालीसिंध और छाबड़ा पॉवर प्लांट के विस्तार से राजस्थान में 830 मेगावाट बिजली अतिरिक्त रहेगी । इसके अतिरिक्त राजस्थान में 32000 मेगावाट की सोलर परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं जिससे कोयला आधारित बिजली की जरूरत ही नहीं रहेगी।

राजस्थान के वर्तमान और विस्तारित पॉवर प्लांटों को मात्र 21 मिलियन टन कोयले की जरूरत है जिसे हसदेव अरण्य की सिर्फ़ PEKB खदान से पूरा किया जा रहा है । राजस्थान को न तो परसा कोल ब्लॉक की जरूरत थी और केते एक्सटेंसन की । यह खदाने सिर्फ अदानी की लूट के लिए खोली जा रही हैं ताकि रिजेक्ट कोयले के नाम पर अदानी के पॉवर प्लांटों तक मुफ्त का कोयला पहुंचता रहे।

प्रदेश की सबसे बड़ी गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना लगातार इस मामले में आंदोलन करती है पर जन आंदोलन बना पाने में असफल रही और सरकारें मनमानी करती रही हैं।

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