छत्तीसगढ़ी: समझौता बनाम स्वाभिमान… गजेंद्ररथ का विश्लेषण जरूर पढ़ें!

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समझौता बनाम स्वाभिमान!

स्वाभिमान का पिलहर कभी भी समझौते की जमीन पर खड़ी नही हो सकती!
देश राज्य और समाजों की आज जो हालत है समझौते की मार खाकर है, ऐसा कहना गलत नही!
देश की आज़ादी, बंटवारा, पाकिस्तान का उदय, हिंदुस्तान का टूटना, सब समझौते की पराकाष्ठा है और आज उसी दर्द को नासूर बनते हमारी पीढ़ियां देख रही हैं।
चंद राजनीतिक लोगों की लालसा और आम लोगों के जीवन कि दिशा बदल जाना, हम भारतीय और वो पाकिस्तानी न जाने और कितने सालों, कितनी जिंदगियों को ख़ाक करके झेलते रहेंगे?

समझौता, यही बड़ी वजह इस छोटे और खनिज संपदा से युक्त प्रदेश छत्तीसगढ़ की भी!
हर कदम पर आम छत्तीसगढ़िया समझौता ही करता है!
ठीक है, जो हुआ सो हुआ कि सोंच हमें दबाने वालों के लिए हौसलामंद परिस्थिति है!

राज्य निर्माण के बाद से ही हमें अपनी मातृभाषा को लेकर तटस्थ रहना था पर हमारे जनप्रतिनिधियों ने समझौते ही किये शायद! तभी तो आज हमें अपनी मातृभाषा के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है?

समझौता बुरा नही अगर स्वाभिमान तटस्थ हो लेकिन अपने अस्तित्व की बाजी लगाकर किया गया समझौता हमें हमेशा के लिए छोटा बना देता है।
सालों पहले जब इस प्रान्त ने अपने आसपास प्रदेशों से आये लोगों को जगह दी, व्यापार और सम्मान दिया तब यह उनकी सहृदयता रही पर आज जब आयातित लोगों ने हमारी राजनीति, हमारे अधिकार और स्वाभिमान कुचलने की शुरुआत की है तब छत्तीसगढ़िया क्रान्ति सेना जैसी कोई संगठन बनानी पड़ी और स्थानीय लोगों के लिए यह जरूरी था भी।

भाषावार प्रान्त रचना संविधान का दिया अधिकार है ऐसे में छत्तीसगढ़िया भी अपनी भाषाई पहचान को अक्षुण करना चाहता है जो उनका अधिकार भी है तो सरकारें इसके लिए ऐतराज़मंद क्यों है?

ज्यादा संतोषी होना आपके अधिकारों के लिए ख़तरनाक!

छत्तीसगढ़ की विशेषता रही यहां के लोगों का सीधापन, कम में खुश रहने की प्रवृत्ति जिसका पूरा फायदा बाहरी लोगों ने उठाया, वनांचल की चार चिरौंजियों को नमक के दाम खरीद कर सोने के भाव बेचने वाले आज इन सीधे साधे लोगों का भविष्य निर्धारण कर रहे हैं और राजनीतिक दलें इन्ही लूटेरों को अपना प्रतिनिधि बनाए बैठे हैं!
पर भी हम छत्तीसगढ़ियों का स्वाभिमान नही जागेगा, क्योंकि हमें बाहरी लोगों के ताकतवर और अमीर होने से उतना दर्द नही जितना अपने लोगों के प्रभावशाली होने पर है?

इस प्रदेश में विडम्बना देखिए, राजभाषा आयोग है पर भाषा आज तक आठवीं अनुसूची में शामिल नही हो पाई!
नेता स्थानीय भाषा में वोट मांगते हैं, सदन में बहस भी करते हैं पर भाषाई अस्मिता के लिए तटस्थ नही हैं, क्यों?

अन्य प्रदेशों की संस्कृति का बढ़ता वर्चस्व और विलुप्त होते छत्तीसगढ़िया भाव!

छत्तीसगढ़ में लंबे समय से परप्रान्तीय समाजों का वर्चस्व रहा है जिसके चलते वर्तमान पीढ़ी को अपनी परंपरागत पहचान का पता ही नही!
बल्कि उल्टा अपनी भाषा और रूढ़ियों को पिछड़ा और दकियानूसी मानने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और यही बड़ा कारण है कि तीव्रता से स्थानीय मान्यताएं ख़त्म हो रही हैं।

हमें अपनी भाषाई अस्मिता की ताकत पहचाननी होगी।

प्रत्येक प्रान्त की भाषाई संरचना उनकी विशेषता रही है पर शायद छत्तीसगढ़िया समाज अपनी भाषाई ताकत कभी पहचान नही पाया और लगातार अपनी पीढ़ियों को अपनी मातृभाषा से दूर करता रहा यह क्रम आज भी जारी है, इसे बदलना होगा।
आपकी भाषाई पहचान आपकी विशेषता है न कि कोई कमजोरी, आप कैसे किसी अन्य भाषा भासी को देख सुन कर प्रभावित होते हैं, आपके पास भी आपकी पारम्परिक भाषा शैली है, आप भी औरों को अपनी भाषा से अपनी ओर आकृष्ट कर सकने की क्षमता रखते हो, कभी आज़मा कर देखो, गर्व होगा।

आलेख: गजेंद्ररथ गर्व
प्रदेश अध्यक्ष- छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ
प्रवक्ता- CKS, CFA
9827909433

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