खोखन खल्लू’ : छत्तीसगढ़ी लोक-संस्कृति का जीवंत मंचन
लेखक: चंद्रशेखर चकोर
विधा: लोक नाट्य (चंदेनी शैली)
भाषा: छत्तीसगढ़ी
छत्तीसगढ़ी साहित्य के फलक पर जब लोक-परंपराओं को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ पिरोया जाता है, तो ‘खोखन खल्लू’ जैसी कालजयी कृतियाँ जन्म लेती हैं। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी चंद्रशेखर चकोर द्वारा रचित यह नाटक केवल एक कागजी दस्तावेज नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत हिस्सा है।
कथानक और शिल्प-
इस नाटक की सबसे बड़ी शक्ति इसकी ‘चंदेनी’ लोक नाट्य शैली है। लेखक ने दृश्यों का संयोजन इस कुशलता से किया है कि पुस्तक के पन्ने पलटते ही पाठक के मानस पटल पर एक आभासी रंगमंच सक्रिय हो जाता है। नाटक के संवादों में जो खनक है और गीतों में जो लय है, वह पाठक को एक दर्शक की श्रेणी में खड़ा कर देती है।
“चकोर जी की कलम जब चलती है, तो वह केवल शब्द नहीं लिखते, बल्कि ठेठ ग्रामीण परिवेश का रेखाचित्र खींचती है।”
प्रमुख विशेषताएं
मंचीय सजीवता: नाटक के दृश्य-विभाजन और मंच-निर्देशन इतने स्पष्ट हैं कि पढ़ते समय नाटक की मंचीय प्रस्तुति आँखों के सामने सजीव हो उठती है।
भाषा की मिठास: चकोर जी ने ‘ठेठ छत्तीसगढ़ी’ और ग्राम्य शब्दावली का जो प्रयोग किया है, वह आंचलिकता के प्रति उनके गहरे अनुराग को दर्शाता है। यह भाषा पाठक को सीधे उसकी जड़ों से जोड़ती है।
संवाद और गीत: नाटक के संवाद प्रभावी हैं और लोक-धुनों पर आधारित गीत कहानी की गति को निरंतर बनाए रखते हैं।
मुहावरे व लोकोक्ति: लेखक की यह कृति आधुनिक जरूर है लेकिन उन्होंने इसमें छत्तीसगढ़ी की प्रचलित मुहावरे व लोकोक्ति का बखूबी प्रयोग किया है।
लेखक का योगदान
चंद्रशेखर चकोर जी ने अपने वर्षों के अनुभव को इस कृति में झोंक दिया है। उनकी सधी हुई कलम से उद्धृत यह नाटक न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि लोक नाट्य की लुप्त होती विधाओं को संरक्षण भी प्रदान करता है। छत्तीसगढ़ी फिल्म लेखन और निर्देशन में उनकी विशेषज्ञता का प्रभाव इस किताब की संरचना में स्पष्ट झलकता है।
अपनी बात
’खोखन खल्लू’ छत्तीसगढ़ी नाट्य साहित्य की एक उत्कृष्ट कृति है। यह पुस्तक उन सभी के लिए संग्रहणीय है जो छत्तीसगढ़ी भाषा, यहाँ के जनजीवन और लोक नाट्य कला से प्रेम करते हैं। लेखक द्वारा प्रदान की गई यह भेंट छत्तीसगढ़ी साहित्य प्रेमियों के लिए किसी अनमोल उपहार से कम नहीं है। यदि आप छत्तीसगढ़ी माटी की सोंधी महक और ग्रामीण जीवन के वास्तविक द्वंदों को महसूस करना चाहते हैं, तो ‘खोखन खल्लू’ को एक बार अवश्य पढ़ें।
