खरोरा: जमीन हमारी, टॉवर तुम्हारी, भटक रही जनता बेचारी! पढ़ें पूरी खबर

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लोमश देवांगन, खरोरा की रिपोर्ट
रायपुर: जिले के खरोरा क्षेत्र में औद्योगिक विकास और किसानों के निजी अधिकारों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। मेसर्स सारदा एनर्जी एंड मिनरल्स लिमिटेड द्वारा बिछाई जा रही 132 के.व्ही. विद्युत पारेषण लाइन के निर्माण ने तूल पकड़ लिया है। क्षेत्र के लगभग 78 किसानो ने कंपनी पर आरोप लगाया है कि उनकी निजी कृषि भूमि पर बिना सहमति और पूर्व सूचना के जबरन टावर खड़े किए जा रहे हैं, जिससे उनकी आजीविका और सुरक्षा दोनों खतरे मे हैं। मामले का खुलासा तब हुआ जब तिल्दा नेवरा एसडीएम कार्यालय द्वारा एक उद्घोषणा जारी की गई। ग्राम बेल्दार सिवनी, मांठ और खरोरा के प्रभावित किसानों का कहना है कि प्रशासन ने 9 अप्रैल 2024 को नोटिस जारी कर आपत्तियां मांगी थीं, लेकिन उन्हें इस पूरी प्रक्रिया से अंधेरे में रखा गया। किसानों ने आरोप लगाया कि राजस्व विभाग, पटवारी और कंपनी अधिकारियों ने उनकी अनुपस्थिति मे ही “संयुक्त मौका निरीक्षण” की खानापूर्ति कर ली और मुआवजे की फाइलें तैयार कर लीं।

“कंपनी और विभाग का पक्षः “विकास के लिए विरोध लाजिमी”: इस विवाद पर सारदा कंपनी के जीएम एच. के. ताम्रकार का कहना है कि कंपनी सभी आवश्यक एनओसी लेकर नियमतः कार्य कर रही है। उन्होंने तर्क दिया कि “गांव वाले अक्सर विरोध करते हैं, लेकिन विरोध के डर से प्रोजेक्ट छोड़ देने पर विकास रुक जाएगा।” वहीं, बिजली विभाग के डीई उमाकांत यादव ने स्पष्ट किया कि यह ऊर्जा विभाग से स्वीकृत निजी एजेंसी का प्रोजेक्ट है और मुआवजे का निर्धारण राजस्व विभाग के हाथ में है।

खेतों मे जान का खतरा और जमीन की कीमत होगी शून्य : एसडीएम कार्यालय में दर्ज शिकायत में किसानो ने अपनी आपत्तियां स्पष्ट की हैं। उनका कहना है कि वे “साधारण कृषक हैं और जमीन ही उनके जीवन का एकमात्र आधार है। खेतों के बीच टावर लगने से खेती की मशीनरी चलाने में बाधा आएगी और हाई-वोल्टेज तारों के सायें में काम करना जानलेवा साबित हो सकता है। किसानो ने दो टूक कहा है कि उन्हें मुआवजा नहीं, बल्कि अपनी पुश्तैनी जमीन सुरक्षित चाहिए। टावर लगने से भूमि की बाजार कीमत भी कौड़ियो के भाव रह जाएगी।

प्रशासन के पाले में गेंद, 21 तारीख पर टिकी निगाहें :
बीते 10 मई को किसानो ने एसडीएम आशुतोष देवांगन के समक्ष अपनी व्यथा रखी, जिसके बाद मामले की अगली सुनवाई 21 मई को तय की गई है। किसानो ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी निजी भूमि पर अवैध निर्माण नहीं रोका गया, तो वे उच्च न्यायालय की शरण लेंगे। फिलहाल, कलेक्टर और पुलिस प्रशासन को भी ज्ञापन सौंपकर हस्तक्षेप की मांग की गई है। अब देखना यह है कि प्रशासन 78 परिवारों के भविष्य और औद्योगिक विस्तार के बीच क्या न्यायसंगत रास्ता निकालता है।

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