छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य कानून और धर्म: पढ़ें गजेंद्ररथ का शानदार विश्लेषण!

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छत्तीसगढ़ सरकार ने धर्म स्वातंत्र्य कानून लाकर प्रदेश में हो रहे धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने की बड़ी कवायद की है लेकिन इस कानून के विरोध में मसीही समाज के लोगों ने जो आंदोलन किया है उसने प्रदेश के मैदानी इलाकों में धर्म परिवर्तन की पोल खोल कर रख दी है।
दरअसल रायपुर के माना तूता में मसीही समाज ने सरकार के कानून का विरोध करते हुए एक बड़ा आंदोलन किया था जिसमें प्रदेश के पत्रकारों ने आंदोलन में पहुंचे भारी संख्या में छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों से पिछड़ा समाज की वस्तु स्थिति स्पष्ट कर दी है।
आंदोलन में मौजूद लोगों से बातचीत में यह बात निकल कर आई की राजधानी के मैदानी क्षेत्र में ओबीसी समाज ने सबसे ज्यादा धर्म परिवर्तन किया है! और दूसरी ओर वह इस बात को मानने से इनकार करते भी नजर आए, उनका तर्क था कि भगवान यीशु मसीह को मानने से धर्म परिवर्तन कैसे हो गया? इस पर पत्रकारों ने पलट कर पूछा कि अब तक भगवान राम में आपकी आस्था थी वह परिवर्तित होकर यीशु मसीह में स्थापित हो गई है, यही तो धर्म परिवर्तन है!
इन सवालों से बचते लोगों ने तरह-तरह के तर्क दिए लेकिन सच्चाई तो यही है की छत्तीसगढ़ की राजधानी में बसे पिछड़ा वर्ग के तमाम लोग धर्म परिवर्तन कर चुके हैं और बड़ी संख्या में यह जारी भी है?

धर्म परिवर्तन के मनोविज्ञान को हम ऐसे समझ सकते हैं

धर्म परिवर्तित लोगों ने बार-बार यह कहा कि जब हमारा कोई नहीं था, किसी ने हमारी मदद नहीं की, बुरे समय में कोई हमारा काम नहीं आया तब मसीही समाज के लोगों ने उन्हें आर्थिक मदद की, सामाजिक सम्मान दिया, स्वास्थ्य सेवाएं दी और इन्हीं सब बातों से प्रभावित होकर ओबीसी के तमाम हिंदू धर्मियों ने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया?
इनमें ज्यादातर मध्यम और गरीब तबके के लोग शामिल हैं!

तो क्या यह माना जाए की आर्थिक असमानता ही धर्म परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह है?
और अगर हां तो सरकारें आर्थिक समानता के लिए नियम बनाएं ना कि धर्म परिवर्तन के लिए!
समाज में लगातार बेरोजगारी बढ़ रही है, खर्चो के एवज में आमदनी कम होती जा रही है!
ऐसे में कन्वर्जन के लिए गरीब और मध्यम वर्ग सॉफ्ट टारगेट हैं जिनकी बड़ी जरूरत पैसा है, काम है, स्वास्थ्य सुविधा और बच्चों की शिक्षा है?
और यह मूलभूत ज़रूरतें सरकारें पूरी कर पाती तो क्या धर्म परिवर्तन जैसे मामलों पर हमारी सरकार को कानून बनाने की जरूरत पड़ती?

भारत के संविधान में धर्म को निरपेक्ष रखा है जिसका तात्पर्य है कि भारत का नागरिक अपनी मर्जी से किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र है, सरकार उन्हें बाध्य नहीं कर सकती कि वह किस धर्म को माने, किसे ना माने!

छत्तीसगढ़ लगातार धर्म परिवर्तन के मामले में देश भर में चिर परिचित रहा है, वनांचल में धर्म परिवर्तन के मामले लगातार इतने बढ़े की सरकार और राजनीतिक दलों को घर वापसी जैसे आंदोलन चलाने पड़े?

आखिर धर्म में रखा क्या है क्यों लोग धर्म के पीछे भाग रहे हैं यह सरकारें या राजनीतिक दलें क्यों धर्म को प्रमुखता दे रही हैं?

क्या वे धर्म के आधार पर राजनीति और सत्ता पाना चाहती हैं या पा रही है इसलिए? या फिर उनका आचरण संविधान से परे है?

जब भारत का संविधान ही धर्मनिरपेक्ष है तो आखिर सरकार क्यों तुली हुई हैं कि देश और प्रदेश में धर्म के धंधे चलते रहे?
आज डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिकों की संख्या कम हो रही है और पढ़े-लिखे युवा बाबा बन रहे हैं, धार्मिक उद्घोषक बन रहे हैं क्यों?
क्या धर्म भी एक कैरियर है या फिर समाज की शक्ति को धर्म के नाम पर किसी विशेष मकसद के लिए इस्तेमाल करने की रणनीति सरकार बनाना चाहती है?

धर्म व्यक्ति का निजी मामला है! लेकिन अब यह कानून के दायरे में आ चुका है, आपको अपनी आस्था किस पर प्रकट करनी है यह स्पष्ट करने के लिए आपको बाध्य किया जा रहा है!
आप किस ईश्वर पर विश्वास रखते हैं इस पर सवाल किए जा रहे हैं!

हमारा देश आखिर किस रास्ते पर है हिंदू राष्ट्र का नारा लगातार लगाया जाता रहा है, सनातन का शंख फूंका जा रहा है फिर भी धर्म परिवर्तन के लिए कानून बनाना हमारी मजबूरी है, जरूरत है या कोई कूटनीतिक चाल इस पर बहस होनी चाहिए?

गजेंद्ररथ गर्व
संपादक – प्रदेशवाद समाचार
प्रदेश अध्यक्ष – छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ, छत्तीसगढ़

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