छत्तीसगढ़ की अस्मिता खतरे में: गजेंद्ररथ 

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तिल्दा: देवरी, घुलघूल में अग्रसेन इस्पात संयंत्र को लेकर भारी जनाक्रोश, छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना से ग्रामीणों ने मांगी आंदोलन के लिए मदद!

यूपी बिहारी गांव की बहु बेटियां लेकर भाग रहा, गुजराती राजस्थानी और हरियाणवी उद्योगपति खेती जमीनों पर काबिज हो रहें!
छत्तीसगढ़ की अस्मिता खतरे में: गजेंद्ररथ

रत्नगर्भा छत्तीसगढ़ कॉर्पोरेट की नजरों में खजाना है और जिस तरह नशे की नींद में यहां की जनता मदहोश है इस प्रदेश को लूटना बहुत आसान है!

प्रदेश की पहचान धान का कटोरा लेकिन बीते दस सालों में खेती का रकबा 50% कम कैसे?
ऐसे, छत्तीसगढ़ एक औद्योगिक राज्य के रूप में विकसित हो रहा है, देशभर से उद्योगपतियों को यहां सस्ती जमीन मुहैया कराई जा रही है, उद्योग स्थापित करने के लिए आसान लोन, आसान कागजी कार्रवाई और कहीं उद्योग लगाने में ग्रामीण आड़े आएं या कोई संगठन आवाज उठाए तो पुलिस प्रशासन उसे डराने धमकाने और जेल में डालने एक पैर पर खड़ी है यानी उद्योगपतियों के लिए छत्तीसगढ़ मुफीद है, यहां की सीधी साधी जनता, राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर में अनपढ़ है, यहां पहले से ही परप्रांत के लोग नेता मंत्री और अफसर हैं, ऐसे में सरकार तो कॉर्पोरेट की ही हुई?

छत्तीसगढ़ की जनता खुद अपना भस्मासुर!

यहां की प्रकृति, प्रेम और भाईचारे की रही है, हर अतिथि देवता और हर याचक को भरपूर दान यहां की पुरातन परंपरा रही है।
ऐसे में अथिति कब घर का मालिक बन गया और याचक कब वाचक बन गया, छत्तीसगढ़ की जनता को पता ही नही चला, सीधा सा उदाहरण, वर्तमान की बीजेपी सरकार में लगभग आयोग और परिषदों में यहां तक के सूचना, जनसंपर्क और सलाहकार परिषद से लेकर राजभाषा आयोग जैसी जगहों पर ऐसे लोग विराजमान हैं जिन्हें छत्तीसगढ़ की प्रादेशिकता, स्थानीयता और अस्मिता से कोई लेना देना नहीं!
प्रदेश की सत्ता दिल्ली दरबार के दरबारी चला रहे हैं ऐसे में स्थानीय स्तर पर लोगों में भारी असंतोष पनप रहा जिसका परिणाम आने वाले दिनों में दिखेंगे।

बढ़ता औद्योगिकीकरण और सांस्कृतिक रूप से प्रदूषित होते गांव!

लगातार खेती जमीनों पर उद्योग लगाए जा रहें, अपनी जमीनों पर खेती करने वाले किसान अब मजदूर बन चुके हैं, उद्योगों में यूपी बिहार से बहुताय में मजदूरी करने पुरुष वर्ग अपने गांवों में लंगोट छोड़ छत्तीसगढ़ आ रहें हैं और यहां जिस घर में किराए से रह रहें वहीं की बहु बेटियों पर अपनी लंगोट ढीली कर रहें!
छत्तीसगढ़ के गांव कस्बों में बहुओं की परप्रांत से आए अनजान लोगों के साथ भाग जाने की घटनाओं का आंकड़ा बढ़ा है, कारण उद्योग में जमीन निकलने पर पैसा मिला, छत्तीसगढ़ का किसान ज्यादा पैसा पाकर शराबी बना, गृहस्थी में विवाद और टूटन, इस तरह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पृष्टभूमि पर लांछन की शुरुआत हुई।

क्या सच में उद्योग ही विकास का पैमाना है?
सरकारें चिल्ला चिल्ला कर विकास का गाना गाती हैं, गांवों में जनप्रतिनिधि, लोगों को उद्योग लगने के फायदे बताते हैं और जब उद्योग खड़ी हो जाती है तब गांव और गांव वालों को कोई पूछता भी नही, खेती तो गई गई, आत्मसम्मान और स्वाभिमान के साथ अस्मिता भी खतरे में, इसलिए छत्तीसगढ़ियों को समय रहते समझना होगा, जागना होगा, प्राकृतिक रूप से सजी और मिनरल्स का भरमार इस धरती के लिए श्राप न बने इसकी जिम्मेदारी इस भुइंया के संतानों को उठाना होगा।

आलेख: गजेंद्ररथ गर्व
प्रदेश अध्यक्ष – छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ, छत्तीसगढ़
प्रदेश प्रवक्ता, मुख्य सलाहकार – छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना, गैर राजनीतिक संगठन, छत्तीसगढ़ फिल्म एसोसियेशन  9827909433

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