10 जून: बलौदाबाज़ार अग्निकांड: एक निर्दोष जेलयात्री की कलम से…पढ़ें!

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10 जून: बलौदाबाज़ार अग्निकांड: एक निर्दोष जेलयात्री की कलम से…

10 जून की तारीख आते ही मन के कई घाव फिर से हरे हो जाते हैं। यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि मेरे जीवन का ऐसा अध्याय है जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।

10 जून 2024 को मैं अपने पूज्य जैतखाम के सम्मान और महकोनी गुफा में हुई तोड़फोड़ के विरोध में आयोजित बलौदाबाज़ार आंदोलन में शामिल होने गया था। समाज आक्रोशित था, और समाज के हर सुख-दुख में खड़े रहने का मेरा स्वभाव मुझे वहां ले गया। उस दिन हजारों लोग अपने अधिकारों और आस्था के सम्मान की मांग को लेकर एकत्रित हुए थे।

शुरुआत में आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था। लेकिन किसी को अंदाज़ा नहीं था कि कुछ असामाजिक और उपद्रवी तत्व उस भीड़ में शामिल होकर पूरे आंदोलन को एक अलग दिशा दे देंगे। देखते ही देखते घटनाक्रम ऐसा बदला कि बलौदाबाज़ार की धरती, जो गुरु घासीदास बाबा की तपोभूमि के रूप में जानी जाती है, एक दुखद घटना की गवाह बन गई।

उस दिन भीषण गर्मी और उमस के कारण मैं दोपहर में ही अपने साथियों के साथ वहां से निकल गया था। जब हम पलारी के पास भोजन करने के लिए रुके, तब हमें आगजनी की घटना की सूचना मिली। उस समय तक मैं घटनास्थल से दूर था और आंदोलन को शांतिपूर्ण समझकर लौट चुका था।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी।

जिस घटना से मेरा कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था, जिसमें न मैं कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद था, न मेरे द्वारा किसी प्रकार की हिंसा की गई, न किसी पर पत्थर फेंका गया और न ही मेरे खिलाफ ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किया गया जो मेरी संलिप्तता साबित कर सके.. फिर भी मुझे गिरफ्तार किया गया।

शायद समाज के मुद्दों पर लगातार मुखर रहना, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और वंचित लोगों के साथ खड़े होना मेरे लिए अपराध बन गया। परिणामस्वरूप मुझे आठ महीने जेल में बिताने पड़े।

जेल की सलाखों के पीछे बिताया गया हर दिन मेरे लिए एक परीक्षा था। सबसे ज्यादा पीड़ा तब होती थी जब परिवार, मित्र और समाज के लोग मुझसे मिलने आते थे। सामने होते हुए भी हम एक-दूसरे को छू नहीं सकते थे। बस लोहे की जालियों के बीच से एक-दूसरे को देखने और कुछ शब्दों में अपने भाव व्यक्त करने की कोशिश करते थे।

ऊपर दिखाई दे रही तस्वीर उसी दौर की है। यह सिर्फ एक जेल की तस्वीर नहीं है, बल्कि उन भावनाओं की तस्वीर है जिन्हें शब्दों में बयां करना आसान नहीं। यह तस्वीर उस इंतजार की है, उस दर्द की है, उस उम्मीद की है जो सलाखों के पीछे भी जिंदा रही।

आज, 10 जून को, मैं उस घटना को याद करते हुए सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि न्याय में देर हो सकती है, लेकिन सच को हमेशा के लिए कैद नहीं किया जा सकता। संघर्ष कठिन हो सकता है, लेकिन सच और आत्मसम्मान के लिए लड़ी गई लड़ाई कभी व्यर्थ नहीं जाती।

मेरी यह पीड़ा सिर्फ मेरी नहीं है। यह उन सभी लोगों की पीड़ा है जो बिना दोष के परिस्थितियों का शिकार बनते हैं। फिर भी मेरा विश्वास आज भी अटल है कि सत्य अंततः विजयी होगा।

कोमल संभाकर, जेल यात्री
धमतरी (छत्तीसगढ़)

फेसबुक पोस्ट से साभार

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