‘छत्तीसगढ़ी’ पहले आठवीं अनुसूची में शामिल कराने आंदोलन करना होगा तब राष्ट्रीय भाषा सूची में शामिल हो पाएगी छत्तीसगढी!
क्योंकि इस बार डिजिटल जनगणना होनी है, आपको कुछ 33 बिंदुओं पर पूछे सवालों वैकल्पिक उत्तर ही दर्ज कराना है और ऐसा नही होता तब भी हम छत्तीसगढ़ियों को हमारी राजभाषा मातृभाषा के रूप में तब तक नही मिलने वाली जब तक 8वीं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी शामिल न हो जाए?
हमने अब तक क्यों अपनी भाषा के लिए नही लड़ा?
प्रदेश के विधायक सांसद जब तक इस मुद्दे पर एकमत नही होते, इसका प्रस्ताव सदन से पारित नही होगा तब तक हमारी लड़ाई जारी रहनी चाहिए और इसके लिए जनता के बीच से मांग आए अपने जनप्रतिनिधियों को वे लिखित और दबाव से ही सही अपनी मातृभाषा को पहचान देने के लिए कर्तव्य निष्ठ हों तब जाकर यह संभव होगा।
छत्तीसगढ़ी भाषा में क्या समस्या?
पहली बात की राष्ट्र में भाषाई पहचान के क्रम में छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी भाषी वर्ग में शामिल है और इसलिए शिक्षानीति के तहत भी आदेश का पालन नही हो सकता, ऐसे में छत्तीसगढ़ी पीछे रह गई?
छत्तीसगढ़ के संभागों में भाषाई विविधता के चलते भी छत्तीसगढ़ी मूल भाषा नही बन पाई?
हल्बी, गोंडी, लरिया, पंडो, खुरुक, सदरी जैसे लगभग एक दर्जन स्थानीय भाषा राज्य के संभागों में प्रचलित है और ऐसे में भाषाई एकरूपता खंडित हो गई इसलिए छत्तीसगढ़ी एक बोली के रूप में ही प्रचलित हुई अब क्योंकि प्रदेश अस्मिता के लिए लड़ रही है ऐसे में भाषाई अस्मिता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, इसे एकजुटता की कड़ी के रूप में देखा जाना लाज़िमी है पर यह लड़ाई अब से पहले ही यानी राज्य निर्माण के साथ ही शुरू होनी थी लेकिन देर से ही सही अब आम जनता को अपनी भाषाई पहचान को स्थापित करने आंदोलित होना होगा!
मातृभाषा छत्तीसगढ़ी के लिए हमारी लड़ाई की शुरुआत है: गजेंद्ररथ गर्व
आज पृथक राज्य निर्माण के 26 सालों बाद प्रदेश की भाषाई अस्मिता के लिए जनता जागरूक हो रही है, प्रदेश की सबसे बड़ी गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना और विभिन्न संगठनों द्वारा लगातार भाषाई पहचान के लिए संघर्ष जारी है, राजभाषा मंच के नंदकिशोर शुक्ल जी और महिला क्रांति सेना प्रमुख दीदी लता राठौर जी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी को लेकर लगातार अभियान छेड़े हुए हैं और आज जो परिवर्तन दिख रहा है उन्ही कामों की बदौलत है।
वहीं CKS हर मंच से छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने और आम जनता से छत्तीसगढ़ी को अपना प्रथम परिचय बनाने अपील करती रही है।
प्रदेश में छत्तीसगढ़ी भाषा की फिल्में बन रहीं हैं, साहित्य सृजन जारी है, राजभाषा आयोग काम कर रही है, कॉलेजों में छत्तीसगढ़ी एम ए पाठ्यक्रम संचालित है इन सब के बावजूद भी कहीं कोई कमी है तो वह राजनीतिक रूप से प्रक्रिया की, प्रदेश के जनप्रतिनिधियों की मंशा पर सवालिया निशान है, आखिर उन्हें अपनी स्थानीयता, भाषाई अस्मिता पर गर्व क्यों नही, क्यों छत्तीसगढ़ी की वैश्विक पहचान उन्हें मंजूर नहीं?
भाषावार प्रांतरचना संविधान निहित है ऐसे में भगवान राम के ननिहाल में आम छत्तीसगढ़िया क्यों अपनी भाषाई पहचान से विमुख है? जनता को आगे आने की जरूरत है।
आलेख: गजेंद्ररथ गर्व
प्रदेश अध्यक्ष – छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ, छत्तीसगढ़
प्रदेश प्रवक्ता, सलाहकार CKS, CFA
