छत्तीसगढ़ थर्ड फ्रंट बनाम बीजेपी-कांग्रेस की राजनीति!
राजधानी रायपुर के एक निजी होटल में बीते दिनों गुपचुप तरीके से छत्तीसगढ़ के 50 से ज्यादा राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने बैठक की यह सुर्खी राज्य की मीडिया में छाई हुई है और छाना भी चाहिए क्योंकि छत्तीसगढ़ अब तक अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती रही है और यह भी सही है कि आज तक थर्ड फ्रंट या कोई तीसरी शक्ति ने छत्तीसगढ़ियों को प्रभावित नहीं किया तो क्या अब जो कोशिश हो रही है वह सफल हो पाएगी?
देखा जाए तो आज जिन परिस्थितियों से छत्तीसगढ़ गुजर रहा है ऐसी परिस्थितियां पहले कभी नहीं हुई! छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य अलंकृत करने का श्रेय लेने वाली भाजपा 15 साल राज करने के बाद फिर से सत्ता में है और इसके पहले प्रदेश को प्रथम मुख्यमंत्री देने वाली पार्टी कांग्रेस भी 5 सालों में अपनी मिट्टी पलीत कर चुकी है!
छत्तीसगढ़ मुख्य रूप से आदिवासी बाहुल्य माना जाता है लेकिन वास्तव में यह प्रदेश ओबीसी बाहुल्य हो चला है! लगातार यह मिट्टी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है और यहां के सीधे-साधे लोग अमीर धरती के गरीब रहवासी कहाते हुए अपना दुखड़ा लिए जीए जा रहे हैं!
तो फिर आखिर भाजपा और कांग्रेस की सरकारों ने क्या किया सिर्फ संसाधनों की लूट सिस्टम में सेंधमारी और भोले भाले छत्तीसगढ़ियों को धोखे दिए?
परिस्थितियां बदल चुकी है भोले भाले लोगों का यह प्रदेश अब भाला के साथ खड़ा दिखता है, अपनी परिस्थितियों पर चिंतन करता है, अपने हक के लिए आवाज उठाता है, अपने लोगों के लिए लड़ाइयां लड़ता है और इस तरह अब छत्तीसगढ़ का आम छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया होने के साथ ही जवाबदार और जिम्मेदार भी हो चुका है!
बीते लगभग एक दशक से प्रदेश की सबसे बड़ी गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना छत्तीसगढ़िया अस्मिता की लड़ाई लड़ रही है आम छत्तीसगढ़ियों के अधिकार के लिए क्रांति कर रही है और यह कहानी अब पूरे देश भर में सुनाई जा रही है की छत्तीसगढ़ अंगड़ाई ले रहा है, छत्तीसगढ़ जाग रहा है, छत्तीसगढ़ अपने आप को पहचान रहा है।
इसका सबसे बड़ा सबूत है तमाम राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का एक मंच पर एक साथ होना चुनाव लगातार लड़े गए हैं और इन तमाम दलों ने भी हर बार राजनीति में अपनी सहभागिता निभाई है लेकिन इस बार सब एक साथ आ रहे हैं क्योंकि इन्हें एक करने के लिए प्रदेश की सबसे बड़ी गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना वचनबद्ध हुई है।
ऊर्जाधानी कोरबा से अधिवक्ता और गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के प्रदेश संयोजक दिलीप मिरी, प्रदेश अध्यक्ष धीरेंद्र साहू सहित उनकी पूरी टीम लगातार प्रदेश के सभी छोटे-बड़े राजनीतिक दलों के संपर्क में रहे सामाजिक संगठनों से संपर्क साधा और इस तरह सबको एक मंच पर लाने की मुहिम कामयाब होते दिख रही है।
छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के भीतर से ही दो प्रादेशिक राजनीतिक दल तैयार हुए हैं जिन्होंने 2023-24 के चुनाव में कुछ खास तो नहीं किया लेकिन एक बड़ी सीख छत्तीसगढ़ की राजनीति को लेकर जरूर मिली और वही सीख अब प्रदेश में तमाम बिखरे हुए राजनीतिक दलों को एक साथ एक ताकत बनकर राजनीतिक लड़ाई का ताकतवर चेहरा बनाने छत्तीसगढ़ में तीसरे मोर्चे को खड़ा करने की कवायत के रूप में सामने आई है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति जातियों में बिखरी हुई है जिस तरह यहां का एससी और एसटी समाज का बड़ा हिस्सा कांग्रेस का समर्थन करता है वैसे ही ओबीसी और सामान्य वर्ग बीजेपी का कट्टर समर्थक माना जाता है लेकिन कुछ सालों में अभी गणित उल्टा होते दिख रहा है!
जिस तेजी से सरकारों ने छत्तीसगढ़ के जंगलों और जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को परेशान किया है अब बड़ी जनसंख्या का भरोसा लगातार बीजेपी और कांग्रेस से उठती जा रही है ऐसे में तीसरा मोर्चा एक बड़ा निर्णायक भूमिका निभा सकता है क्योंकि अब जनता को चुनने के लिए विकल्प रहेगा और लगातार छलने वाली राजनीतिक दलों को जवाब देने के लिए तीसरा दल भी!
आशावादी होकर जनता को इस तीसरे मोर्चे का साथ देना चाहिए!
छत्तीसगढ़ अपने निर्माणकाल से ही छला जा रहा है और यहां के लोग भी एक बार कांग्रेस एक बार बीजेपी फिर एक बार कांग्रेस और फिर एक बार बीजेपी कर चुके है अब ऐसे में उन्हें एक बार यह प्रयोग भी करना जरूरी है की क्यों ना किसी तीसरे विकल्प को आजमाया जाए।
छत्तीसगढ़ में क्योंकि अब तक कोई भी ऐसा क्षेत्रीय दल ताकतवर नहीं हुआ है जो खुद अकेले अपने दम पर सत्ता की दावेदारी कर सके, ऐसे में सभी दलों का एक साथ आना एक सुखद संदेश है कि अब हम एक मंच पर एक साथ एक होकर यह लड़ाई लड़ेंगे और अपने प्रदेश की अस्मिता जल जंगल जमीन लोगों के अधिकार, स्थानीयता, सांस्कृतिक विरासत पर बात करेंगे।
इस प्रयास में आम छत्तीसगढ़ियों का शामिल होना जरूरी है क्योंकि यह लड़ाई उन्हीं के लिए है यह व्यवस्था उनके अधिकारों के लिए है, ऐसे में छत्तीसगढ़ के सभी वर्गों को इस तीसरे मोर्चे के लिए आगे आना होगा ऐसी भावनाएं विकसित करनी होगी कि लोगों को यह तीसरा विकल्प अपने प्रदेश के पुनर्निर्माण के लिए मील का पत्थर लगे।
आने वाली 25 अक्टूबर को यह पूरी तरह से स्पष्ट हो जाएगा की कौन और कितने क्षेत्रीय राजनीतिक दल और सामाजिक संगठनों की सहमति इस तीसरे मोर्चे को मिल रही है और इसे किस नाम से जाना जाएगा?

