छत्तीसगढ़ के राज्यगीत के रचयिता डॉ. नरेंद्र देव वर्मा
छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और अस्मिता के अमर साधक
छत्तीसगढ़ की माटी, संस्कृति, भाषा और अस्मिता को अपनी लेखनी से स्वर देने वाले महान साहित्यकार, कवि, नाटककार, उपन्यासकार एवं भाषाविद् डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का नाम छत्तीसगढ़ के साहित्यिक इतिहास में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।
उनके द्वारा रचित गीत ‘अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार’ आज छत्तीसगढ़ का राज्यगीत है। यह गीत केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना और छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान का प्रतीक बन चुका है।
1. जन्म एवं पारिवारिक परिचय
डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का जन्म 4 नवंबर 1939 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के सेवाग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम स्वर्गीय धनीराम वर्मा था। उनके परिवार में शिक्षा, साहित्य और सामाजिक चेतना का विशेष वातावरण था।
उनके बड़े भाई स्वामी आत्मानंद छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध आध्यात्मिक चिंतक एवं शिक्षाविद् थे। स्वामी आत्मानंद के विचारों और व्यक्तित्व का प्रभाव नरेंद्र देव वर्मा के जीवन पर भी रहा।
2. शिक्षा एवं अकादमिक उपलब्धियां
डॉ. वर्मा प्रारंभ से ही अध्ययनशील और साहित्य के प्रति समर्पित व्यक्ति थे।
उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. किया।
वर्ष 1966 में ‘प्रयोगवादी काव्य और साहित्य चिंतन’ विषय पर शोध के लिए पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
वर्ष 1973 में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान में एम.ए. किया।
इसी वर्ष ‘छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्भव एवं विकास’ विषय पर शोध के लिए दूसरी पीएचडी प्राप्त की।
उनका शोधकार्य छत्तीसगढ़ी भाषा के ऐतिहासिक, भाषाई और साहित्यिक विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
3. साहित्यिक योगदान
डॉ. नरेंद्र देव वर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि नाटककार, उपन्यासकार, कथाकार, समीक्षक, भाषाविद् और कुशल वक्ता भी थे।
उन्होंने हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं में साहित्य सृजन किया।
उनकी प्रमुख रचनाएं हैं—
अपूर्वा – छत्तीसगढ़ी गीत संग्रह।
सुबह की तलाश – हिंदी उपन्यास।
छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकास।
हिंदी स्वच्छंदतावाद एवं प्रयोगवाद।
नई कविता : सिद्धांत एवं सृजन।
हिंदी नव स्वच्छंदवाद।
मोला गुरु बनई लेते – छत्तीसगढ़ी प्रहसन।
इसके अतिरिक्त उन्होंने विभिन्न आध्यात्मिक एवं साहित्यिक रचनाओं के अनुवाद भी किए।
उनकी लेखनी में छत्तीसगढ़ के गांव, लोकजीवन, संस्कृति, परंपरा और आम आदमी की संवेदनाएं दिखाई देती हैं।
4. ‘अरपा पैरी के धार’ : छत्तीसगढ़ की अस्मिता का स्वर
डॉ. नरेंद्र देव वर्मा की सबसे चर्चित और ऐतिहासिक रचना है—
‘अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार…’
इस गीत में छत्तीसगढ़ की नदियों, प्राकृतिक संपदा, संस्कृति और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का भाव समाहित है।
गीत की शुरुआती पंक्तियां हैं—
अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार,
इंद्रावती हा पखारय तोर पईयां।
महूं विनती करव तोर भुइयां,
जय हो, जय हो छत्तीसगढ़ मईया।
यह गीत छत्तीसगढ़ की सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बन गया।
3 नवंबर 2019 को छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव के अवसर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस गीत को राज्यगीत घोषित किया। 18 नवंबर 2019 को इसकी अधिसूचना भी प्रकाशित हुई। इसके बाद यह गीत प्रदेश के महत्वपूर्ण शासकीय आयोजनों का अभिन्न हिस्सा बन गया।
5. पारिवारिक संबंध
डॉ. नरेंद्र देव वर्मा की पुत्री मुक्तेश्वरी वर्मा का विवाह छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से हुआ है। इस कारण उनका पारिवारिक संबंध भी सार्वजनिक जीवन में चर्चा का विषय रहा है।
6. असमय निधन
छत्तीसगढ़ी साहित्य और भाषा के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का निधन 8 सितंबर 1979 को रायपुर में हुआ।
वे मात्र 39 वर्ष की आयु में इस संसार से विदा हो गए। हालांकि कुछ स्रोतों में उनकी आयु 40 वर्ष भी लिखी गई है, लेकिन जन्म और निधन की तिथियों के अनुसार वे 39 वर्ष के थे।
उनका जाना छत्तीसगढ़ के साहित्यिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति थी।
7. डॉ. नरेंद्र देव वर्मा की साहित्यिक विरासत
डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ का राज्यगीत लिखा। उनका वास्तविक योगदान छत्तीसगढ़ी भाषा को साहित्यिक और अकादमिक पहचान दिलाने में भी है।
उन्होंने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि छत्तीसगढ़ी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध शब्द संपदा, व्याकरण, साहित्य, लोकसंस्कृति और स्वतंत्र अभिव्यक्ति वाली भाषा है।
आज जब छत्तीसगढ़ी अस्मिता, भाषा और संस्कृति की चर्चा होती है, तब डॉ. नरेंद्र देव वर्मा का साहित्य और चिंतन प्रासंगिक दिखाई देता है।
एक विचारणीय बात
छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना में गाया जाने वाला ‘अरपा पैरी के धार’ हमें केवल अपनी धरती का गुणगान करना नहीं सिखाता, बल्कि अपनी नदियों, जंगलों, पहाड़ों, भाषा और संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी का बोध भी कराता है।
डॉ. नरेंद्र देव वर्मा भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके शब्दों में छत्तीसगढ़ महतारी आज भी जीवंत हैं।
उनकी जयंती पर उन्हें सादर नमन और विनम्र श्रद्धांजलि।

