रथयात्रा और रथ…से गजेंद्ररथ की कहानी पढ़ें!

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बाबूजी आज के दिन ही जन्म लिए थे और उनका नाम रथ रखा गया…!!

बचपन में नानी ने बताया था, मां की शादी के बाद जब कुछ महीनों में लिवाने बाबूजी अपने ससुराल गए जो महानदी के उस पार सिरपुर से लगा हुआ खड़सा गांव है तब मां के साथ उसके मायके का कुत्ता भी नदी पार कर ससुराल खरोरा आ गया था।
वैसे मां को दहेज में कुछ महुआ और आम के पेड़ मिले थे पर उसे साथ लाया नहीं जा सकता था पर आज तक वे मां और अब मेरे हैं!
कुत्ता घर आया तो मेरे दादा गुस्साए! पर था तो मां का कुत्ता वह जीवन भर खरोरा में ही रहा, बड़े मामा जब खरोरा आते कुत्ते का हाल चाल पहले लेते!

बात साल 2007 की है मैं FTII से निकलकर मुंबई में धर्मेश दर्शन प्रोडक्शन की फिल्मों पर काम कर रहा था, तब सैमसंग की एरियल वाली मोबाइल रखा करता था, मां पड़ोसी की लैंडलाइन से कॉल करती और हाल चाल पूछती, रोती और जल्द वापस आने कहती!
एक दिन मां ने बताया एक कुतिया हर दिन दरवाजे पर बैठी रहती है, मैंने कहा, क्या मां ये सब मुझे क्यों बताने लगी हो, मां ने कहा, छोड़ों हां सुनों जल्दी वापस आ जाओ तुम्हारे बाबूजी कुछ बीमार से लग रहे हैं, मुझे लगा जल्दी लौटने के लिए जाल फेंक रही है और भी बहुत बातें हुई जैसा लगभग होते रहता था।

उस दिन का कॉल सामान्य नही था, तेरे बाबूजी को खून की उल्टी हुई है कहते हुए मां रो रही थी मैं मां की हर बात समझता था वह ऐसी बातों को ऐसे ही नही कहती, मैंने बाबूजी से बात की उन्होंने टालते हुए कहा, ऐसे ही अचानक हो गया बड़ी बात नहीं है, तुम अपना काम करो!
लेकिन उस रात मुझे नींद नहीं आई, मैं अपने माता पिता का अकेला संतान हूं और मुझे उनके पास होना चाहिए, मैंने सुबह उठते ही ट्रेन पकड़ ली, मुंबई से रायपुर फिर खरोरा पहुंचा, डॉक्टर बंछोर चाचा से मिला, उन्होंने कहा, रायपुर में किसी बड़े डॉक्टर को दिखाओ!
मैं दूसरे ही दिन विशेषज्ञ डॉ के पास पहुंच गया इंडोस्कोपी हुई, बायोप्सी के लिए भेजा गया और आखिर में कैंसर डिटेक्ट हुआ वो भी थर्ड स्टेज!
मेरी दुनिया बिखर चुकी थी!
किसे बताऊं, किससे छुपाऊं बस हम तीन ही थे, मां को बता नही सकता था, बाबूजी को कैसे बताता?
उस पल से मेरी जिंदगी बदल गई।

दादी ने बाबूजी के नामकरण और जन्म की कहानी बताई थी, रथ यात्रा का दिन था, खरोरा में तब भगवान जगन्नाथ अपने परिवार के साथ भ्रमण करते थे, दादी के पेट में बच्चा था रथ घर के सामने आकर रुका तो वह पूजा कर प्रसाद ले आई और प्रसव पीड़ा से व्याप्त जिस बच्चे को जन्म दिया उसका नाम रथ ही रखा, दादी ने बताया था की जब वह रथ के पहिए पकड़ कर खड़ी थी तब पेट का बच्चा उछल रहा था मानों रथ को धक्का दे रहा हो!

रथ कुमार के लिए लिखना व्यर्थ है आज नगर और तब के लोग उन्हें अच्छे से जानते और मानते थे अब तो रथ हैं नही पर छोड़ गए हैं अपने पीछे गजेंद्ररथ!

कैंसर ने बाबूजी को 49 के उम्र में ही गोलोकवासी बना दिया, इससे पहले मेरी फिल्म बैर रिलीज हुई बाबूजी ने देखी सुकून से मर गए!

आज उनका अवतरण दिन है, जन्म जयंती कह लें…
मेरे पिता सिर्फ पिता नहीं थे, दोस्त थे जो मेरे भीतर आज भी जिंदा हैं!
उनकी लेखनी ने मुझे लक्ष्य दिया उसी लक्ष्य को पाने मैं हमेशा लड़ रहा हूं, किसी दिन मैं बाबूजी से मिलूंगा हमारी अधूरी दोस्ती उस दिन पूरी हो जायेगी!

मैं अभागा हूं, बाबूजी को कांध पर बिठा अग्नि शैय्या में लिटाया था और फिर अपने ही अंश को बेटे आलोकरथ के निर्जीव कोमल देह को भी जन्म के 5 घंटे बाद धरती मां की गोद में सौंपा था।

इस जन्म में मैंने पिता और पुत्र दोनों का अंतिम संस्कार किया है, ईश्वर किसी पिता से बेटे का अंतिम संस्कार न कराए!

आज बाबूजी फिर से निकले हैं अपनी पीठ पर जगत के पिता को बिठाए, हे जगन्नाथ आज हर पिता की इच्छा पूरी करना…

गजेंद्ररथ ‘गर्व’

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