गांव के जोगी जोगड़ा
आन गांव के सिद्ध!!
छत्तीसगढ़ के हर क्षेत्र में ये कहावत चरितार्थ हो रही है!
अभी पहली बार छत्तीसगढ़ के साहित्य में शुक्ल जी ने डंका बजाया, मोदी जी ने कॉल कर उनका हाल चाल जाना!
वहीं छत्तीसगढ़ में मातृभाषा के एक वरिष्ठ साहित्यकार जिन्हें मैं कहूं की जीवित साहित्यकारों में आज वे प्रदेश के बड़े हस्ताक्षर हैं तो गलत नही होगा।

यूं तो परदेशी राम जी वर्मा अभी छत्तीसगढ़ी के सबसे मूर्धन्य साहित्यकार के रूप में चिन्हें जाते हैं उन्हें छत्तीसगढ़ी का प्रेमचंद कहना गलत न होगा, उनकी लेखनी में ग्राम्य जीवन सांस लेती है!
वहीं एक और बड़े और शांत साहित्यकार अपने जीवन में दर्द झेलते साहित्यसेवा कर रहे हैं, लकवा ग्रस्त होते हुए भी छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।

सुशील भोले जी को छत्तीसगढ़ का शायद ही कोई साहित्यकार, कवि, कलाकार, पत्रकार नही जानता हो?
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन को अपनी लेखनी से बल देने वाले, छत्तीसगढ़ी कला साहित्य और पत्रकारिता के साथ आदिम संस्कृति को आमजन तक शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने वाले श्री भोले अभी लकवा ग्रस्त हैं, यह समय उन्हें मदद करने की है, भले ही वे खुद आज तक कभी मदद या किसी तरह से जरूरतमंद होने वाली बात नहीं कहें, दरअसल यह छत्तीसगढ़िया प्रवृत्ति है इस प्रदेश का कोई भी सच्चा साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार कभी अपने से होकर किसी से कुछ नही मांगता, अपनी मुफलिसी भी उन्हें राजसी ठाठ से कम नहीं लगते, ऐसा नहीं है, बस हमें मांगना कभी आया ही नहीं और किसी अपने ने हमारे लिए कभी कुछ मांगा भी तो नहीं!
जैसा की अन्य आयातित लोग हमारे ही प्रदेश में हमारे ही सरकार से खुद को बड़ा बता कर न जाने क्या क्या सम्मान पा लेते हैं, एक आयातित वर्ग विशेष का साहित्य में कब्जा जैसा हो गया है और अन्य के लिए उसकी बौद्धिक क्षमता केवल थोथी सराहना के लिए?

श्री सुशील भोले जी से भेंट हुए साल बीत चुके हैं जब मैं उनसे मिला था वे बिस्तर पर लकवा ग्रस्त थे और आज भी हैं फिर भी हर दिन साहित्य सृजन कर रहे हैं, लकवा ग्रस्त होने के चलते अपनी एक हाथ से वे मोबाइल पर धाराप्रवाह छत्तीसगढ़ी टाइप करते हैं, प्रदेश के हर पुरखों के साथ बिताए या उनकी सृजनशैली का विस्तार अपने फेसबुक वॉल पर करते रहते हैं, हर तीज त्यौहार पर बताना नही भूलते की यह क्यों मनाया जाता है, इसके पीछे प्रकृति देवता की कौन सी कहानी और आशीर्वाद है।

संजय नगर टिकरापारा रायपुर के उनके निवास पर मैंने देखा वे अपनी बेटी दामाद के साथ रहते हैं, दिनभर प्रदेश भर के गुणिजन उनसे मिलने आते रहते हैं, लकवा ग्रस्त होने के बाद भी उनमें जबरदस्त ऊर्जा है पर दुख इस बात का है की इतने वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, संस्कृति और भाषा के रखवार को हमारी सरकार कभी किसी सम्मान के लिए सुरता नही करती और तो और उन्हें किसी किस्म का कोई मासिक सहयोग सम्मान राशि नही मिलती, वहीं ज्ञात हुआ है की मध्यप्रदेश के तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार हर महीने पेंशन के रूप में तीस हजार भोपाल में बैठ कर झोंक रहे हैं!
इस प्रदेश में नीति नियम निर्धारित करने वाले यहां के नही हैं, उनको इस प्रदेश के जमीनी साहित्यकारों की कोई खबर नहीं! मीडिया जिन्हें हाईलाइट कर देती है वही बड़ा साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार हो जाते हैं, यहां तो मैंने एक सुशील भोले जी की बात लिखी न जाने कितने गांव के जोगी जोगड़ा बने आन गांव के सिद्ध साहित्यकारों के झोले में सांस ले रहे हैं, गलती हमारी है, क्यों हम अपने आस पास के लोगों की काबिलियत कम आंकते है और बाहर से आने वालों के चरण वंदन कर उन्हें सर में उठा लेते हैं, ठीक है अतिथि देवो भव पर जब तक वो अतिथि बने रहें?
कवि सम्मेलनों की बात करें, गायन या अभिनय की बात करें या अन्य कोई भी विधा की छत्तीसगढ़ हीरे का खदान यूं ही नहीं कहलाता, बहुत काबिल लेकिन चुपचाप सहने वाले लोगों का गढ़ है छत्तीसगढ़! शायद इसी लिए सबले बढ़िया हमें ही कहा जाता है?

मैं गजेंद्ररथ गर्व, प्रदेश अध्यक्ष, छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ इस मंच से सरकार को जगाना चाहता हूं और मैं सरकार के पास पहुंचकर भी अपनी बात कहूंगा कि आप इस मिट्टी में जन्में धरोहरों का सम्मान करें तब जाकर कहीं इस प्रदेश के नव सृजन का अर्थ साकार होगा।
आज 25 वर्षों में भी प्रादेशिक संस्कृति के शीर्ष साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार या जिस विधा में भी उत्कृष्ठ हैं वे गुमनाम हैं और न जाने कैसे कैसे कौन लोग रजत जयंती समारोह के मंच पर इठला रहे हैं तब हमारा अलग राज्य पाने का मतलब क्या रह गया?
