जागौ…रे !
अब नइ आही वीरनारायण,
न गुण्डाधुर अब जनम लिही !
बबा घासी घलो गुनत होही
महतारी बर अब कोन जिही ?
दाई तेलीन सत्ती के कोरा
पुत के रद्दा देखत हावे…
देख बिलासा अपन भुइंया ल
अरपा धार रोवत हावे…
सुर मस्तुरिहा के हिचकत हे
अब तो जागौ माटी पुत
पुरखा खूबचंद के सपना
का सपना बन रही जाही ?
ठाकुर प्यारे लाल के छाती
छन्नी हो दुख पावत हे,
पंडित सुंदर लाल के लिखना,
का लिखना भर रही जाही ?
बाबा बालक दास कस गरजव,
तुम बागी, बलिदानी हव…
संग रेंगव रद्दा जस बनही,
तुम महानदी के पानी अव…
अब के अगोरा, जुच्छा रइही
अनगइंहा अब जीव लेवत हे,
मजधार म फंसे हे डोंगा,
बेसुध मनखे खेवत हे…
अब नइ आही वीरनारायण,
न गुण्डाधुर अब जनम लिही !
बबा घासी घलो गुनत होही
महतारी बर अब कोन जिही ?
गजेंद्ररथ वर्मा, ‘गर्व’ 9827909433
प्रदेश अध्यक्ष, छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ