धान में बैक्टीरियल ब्लाइट: बदलती परिस्थितियों में रोग की पहचान एवं प्रबंधन
आईसीएआर–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान द्वारा किसानों सलाह
धान भारत की प्रमुख खाद्य फसलों में से एक है। छत्तीसगढ़ सहित देश के कई धान उत्पादक क्षेत्रों में बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट एक महत्वपूर्ण रोग है। यह रोग मुख्य रूप से Xanthomonas oryzae pv. oryzae नामक जीवाणु के कारण होता है। छत्तीसगढ़ में धान उत्पादन की प्रमुख जैविक समस्याओं में बैक्टीरियल ब्लाइट भी शामिल है।
रोग को पहचानना जरूरी
बैक्टीरियल ब्लाइट की शुरुआत सामान्यतः पत्ती के किनारे या सिरे से होती है। संक्रमित पत्तियों पर पानी से भीगे हुए हल्के पीले अथवा पीले-हरे रंग के धब्बे या धारियां दिखाई देती हैं। समय के साथ ये लक्षण पत्ती के बड़े हिस्से में फैल जाते हैं और पत्तियां पीली होकर भूसे के रंग की दिखाई देने लगती हैं तथा अंततः सूख सकती हैं। पौधे की प्रारंभिक अवस्था में गंभीर संक्रमण होने पर ‘क्रेसेक’ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसमें पौधे मुरझाने लगते हैं।

इस रोग की समय पर पहचान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआती लक्षण कई बार अन्य पत्ती रोगों से मिलते-जुलते दिखाई दे सकते हैं। खेत में संदिग्ध पौधों की पहचान होने पर वैज्ञानिक या कृषि विशेषज्ञ से रोग की पुष्टि कराना उपयोगी होता है।
रोग कब और क्यों बढ़ता है?
बैक्टीरियल ब्लाइट के लिए सामान्यतः 25–34°C तापमान और 70 प्रतिशत से अधिक सापेक्ष आर्द्रता अनुकूल मानी जाती है। लगातार बारिश, तेज हवा, अधिक नमी तथा खेत में पानी की अधिकता रोग के विकास और प्रसार को बढ़ा सकती है। अत्यधिक नाइट्रोजन उर्वरक, विशेषकर देर से की गई अधिक नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग, भी रोग की गंभीरता बढ़ा सकती है।
एंटीबायोटिक के उपयोग में सावधानी जरूरी
आवश्यकता एवं अनुशंसा के अनुसार कॉपर आधारित फफूंदीनाशक जैसे कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का उपयोग [2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से] भी किया जा सकता है। हालांकि, एंटीबायोटिक का अनावश्यक, बार-बार अथवा अधिक मात्रा में छिड़काव नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए किसानों को स्थानीय कृषि विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र अथवा कृषि विभाग की वर्तमान अनुशंसा के अनुसार ही उपचार करना चाहिए
किसानों के लिए संदेश :
धान में पत्तियों के किनारों से शुरू होने वाला पीलापन, पानी से भीगे हुए धब्बे या धारियां, पत्तियों का भूसे के रंग में बदलना तथा पौधों का मुरझाना दिखाई दे तो किसान सतर्क रहें। विशेषकर वर्षा और अधिक आर्द्रता वाले मौसम में खेत की नियमित निगरानी करें।
रोग प्रबंधन के लिए प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों का चयन, संतुलित पोषण, उचित जल प्रबंधन, खेत की स्वच्छता और समेकित रोग प्रबंधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। एंटीबायोटिक या अन्य रसायनों का उपयोग केवल वर्तमान सरकारी अनुशंसाओं और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

