स्व. सुशील भोले को अंतिम विदाई: छत्तीसगढ़ी साहित्य का सूर्य हुआ अमर! सरकार की उदासीनता पर बोले गजेंद्ररथ!

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छत्तीसगढ़ में आदि धर्म संस्थान के संस्थापक वरिष्ठ साहित्यकार कवि लेखक पत्रकार और आदि धर्म मर्मज्ञ सुशील भोले जी का 27 फरवरी को राजधानी रायपुर के बूढ़ा तालाब स्थित मारवाड़ी मुक्ति धाम में अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।
इस मौके पर बड़ी संख्या में कला, साहित्य, फिल्म और पत्रकारिता से जुड़े लोगों की उपस्थिति रही।
श्री सुशील भोले मूल रूप से रायपुर जिला स्थित नगरगांव के निवासी थे और एक लंबे अरसे से रायपुर में कला संस्कृति और छत्तीसगढ़ी राजभाषा के लिए कार्य करते रहे हैं।
छत्तीसगढ़ी की एकमात्र पत्रिका मयारू माटी का संपादन भी वे लंबे समय से करते आ रहे थे साथ ही कोंद भैरा के गोठ व्यंग के माध्यम से प्रदेश की सामाजिक राजनीति परिस्थितियों पर चोट करते रहे हैं।
लंबे समय से लकवा ग्रस्त होते हुए भी उनकी लेखनी अनवरत जारी रही, मोबाइल स्क्रीन पर एक हाथ से ही धाराप्रवाह छत्तीसगढ़ी में लिखते रहे।

प्रदेश के तीज त्योहार की विशेषता का आदि धर्म से जुड़ाव वह लगातार छत्तीसगढ़ के जनमानस को बताते रहे, प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं को जीवंत रखने उनका लेखन लगातार जारी रहा प्रदेश के पूर्वजों की जीवनी और यादों को पुरखा के सुरता में लिख गई आलेख आज भी जनमन को अपनी गौरवशाली इतिहास का भान कराती है।

अपनी पत्रकारिता के समय से ही प्रदेश के मूर्धन्य व्यक्तित्वों के संपर्क में वे लगातार रहे और उनके जीवन का सार बताते हुए उनकी लेखनी आज अमर हो चुकी है।

मुक्तिधाम में आज उनका पार्थिव शरीर अग्नि के हवाले हो चुका था और वे पंचतत्व में विलीन हो गए लेकिन उनके चाहने वालों का हुजूम जलती चिता के आसपास उन्हें देर तक निहारती रही, लोगों का गुस्सा इस पर भी दिखा इतने दिग्गज साहित्यकार की मृत्यु का शोक प्रकट प्रशासनिक स्तर पर कहीं नहीं हुई यूं तो प्रदेश के मुखिया हर छोटी बड़ी बातों पर बधाई और शोक प्रकट करते रहे हैं लेकिन एक मूर्धन्य साहित्यकार के निधन पर उनके सोशल मीडिया हैंडल से एक शब्द जारी न होना साहित्य समाज को खला है।

छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष गजेंद्ररथ गर्व ने इस पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, यह व्यवहार बिल्कुल ही अनुचित है यही कहीं किसी वर्ग विशेष परप्रांति व्यक्ति होता तो दर्जनभर मंत्री शोक प्रकट कर चुके होते लेकिन एक आम छत्तीसगढ़िया साहित्यकार अपनी मौत के बाद भी एक अदत श्रद्धांजलि के लिए तरस जा रहा है।

गजेंद्ररथ ने भोले जी के सानिध्य को याद करते हुए आज से 2 साल पहले छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ की नींव रखने का समय भी याद किया और बताया की श्री सुशील भोले के मार्गदर्शन में ही यह शुरुआत हुई और वे ही इस प्रादेशिक संगठन के वरिष्ठ संरक्षक थे आज उनका ना होना उनकी व्यक्तिगत क्षति है, गजेंद्ररथ ने कहा की श्री भोले न केवल एक साहित्यकार बल्कि आदि धर्म के प्रकांड ज्ञाता रहे हैं, वे लगातार छत्तीसगढ़ में आदि धर्म शिव का प्रचार प्रसार करते रहे हैं और लगातार जल जंगल जमीन की रक्षा के लिए लिखते रहे हैं, उनकी लेखनी में अपने प्रदेश और प्रदेशवासियों के लिए भारी अकुलाहट दिखती है, वे वर्तमान परिस्थितियों से लड़ने और प्रकृति सत्ता स्थापित करने के पक्ष में सदैव लिखते रहे हैं।

उनके अंतिम संस्कार में उपस्थित छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन के प्रमुख जागेश्वर दादा ने श्री भोले जी के बचपन को याद किया और बताया की बालपन से ही वह सुशील को जानते थे और उनका इस तरह चले जाना छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी के लिए एक बड़ा खालीपन है।
छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के प्रदेश संरक्षक दादा ठाकुर रामगुलाम उन दिनों को याद करते भावुक हो गए जब श्री सुशील भोले एक पत्रकार के रूप में छत्तीसगढ़ की भाषा संस्कृति और अंतिम पंक्ति के व्यक्ति की लड़ाई लड़ रहे थे।

आज उनकी अंतिम यात्रा में पत्रकार महासंघ के सदस्य एम ए छत्तीसगढ़ी छात्र संघ के साथी सहित कई अखबारों के संपादक भारी संख्या में उपस्थित रहे और श्री भोले को अंतिम विदाई देते हुए सभी की आंखें नम रही।

जीवन पर्यंत साहित्य साधना करने वाले सुशील भोले ने कभी पद और प्रतिष्ठा की लालसा नहीं की और सरकारों ने भी कभी यह नहीं सोचा की इस छत्तीसगढ़िया मूर्धन्य विद्वान को किसी प्रतिष्ठित उपमा से अलंकृत किया जाए, यहां तक कि वे अपने अंतिम दिनों में मायूस ही रहे, वैसे तो छत्तीसगढ़ संवाद और जनसंपर्क मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और न जाने किन-किन प्रदेशों के पत्रकारों को लाखों का पेंशन बांट रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ़ी का यह दुलरवा बेटा हमेशा खाली हाथ ही रहा, अब आम छत्तीसगढ़ियों को ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए कमरकस तैयार होना होगा!
उनके अपने ही प्रदेश में उनके धरोहरों के साथ ऐसा व्यवहार आखिर आम छत्तीसगढ़िया झेल कैसे रहा है?
सत्ता शासन में बैठे तथाकथित बुद्धजीवी और बड़े साहित्यकार जो आज अपने एक साहित्यकार साथी की अंतिम यात्रा में खुद को शामिल नहीं कर पाए आखिर में अपने साथ के लोगों का क्या ही भला कर पाएंगे?
यह बड़ा सवाल हर प्रदेशवासी के मन में उठ रहा है।
सुशील भोले जी अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी लेखनी उनके विचार उन्हें अनंत काल तक जीवंत रखेगी, उनकी कालजई रचनाएं पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे आने वाले बच्चों के लिए एक प्रेरणा सिद्ध होगी, उन्हें अंतर मन की गहराइयों से अंतिम प्रणाम श्रद्धांजलि जोहार!

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