मैंने हमेशा अपने बाबूजी के सपने से प्यार किया, मुझे इस बात का पता तब चला जब वो मुझे छोड़ कर जाने वाले थे!
प्रेम और ईश्वर को पाने का रास्ता एक ही है, अपने अंदर प्रेम भर दो, आसपास वह खुद ही बिखर जायेगा और फिर आपको अहसास होगा ईश्वर आपके भीतर ही कहीं बैठा है।
बाबूजी की बातें तब मुझे समझ नही आते थे, मैं उनका चेहरा देख कर मुस्कुरा देता और वो भी।
कब मुझे उनके सपने से प्यार हो गया मैं समझ नही पाया, मैं उनकी बातों यादों और अधूरे ख्वाबों को जीने लगा था, मैं चाहने लगा था उन सपनों को जो मेरे बाबूजी को सोने नहीं देते, वो लिखते रहते, उन लकीरों में बाबूजी का दर्द मैं पढ़ता रहता छुप छुप कर और जिद्द ठान ली अब वो सपने अधूरे नही रहेंगे।
कभी कोई ऐसे वक्त में जी रहा हो जिसमें घुटन भरा हो, लोगों को जो समझाना चाह रहा, जैसा करना चाह रहा वैसा कर न पाना, कितना दुख देता है, अब मैं समझ रहा हूं।

अपने सपनों को मार देना खुद को मार देना ही तो है, बाबूजी ने यह नही किया, अपने जाते हुए लम्हों में उन्होंने वो सपने मेरी आंखों में भर दिए और वे खुद मेरे भीतर घुल गए।
ये ऐसा मैं कहां लिख पाता, मेरे भीतर जो घुला हुआ है उनका ही असर तो है।
अकेले बहुत दूर जब मैं याद करता, वो सामने बैठ जाते, सब कुछ वैसा ही हो जाता जैसा घर में उनके साथ।
मैंने उनका सपना जिया, प्यार किया और अपना सब कुछ उनके सब कुछ में मिला दिया, मैं उनका ही तो था फिर मेरा अपना भी तो वही थे।
मैंने देखा उन्हें सर्दियों में ठिठुरते, पसीने से नहाते चिलचिलाती धूप में और मेरा सपना मजबूत होता रहा।
उनके चेहरे की मुस्कुराहट पाकर खिलते मेरे चेहरे का रंग मुझसे कहता रहा हमेशा, तुम्हें अपना प्यार पाना है।
मैंने जीता अपना प्यार पर तब तक वक्त खेल बैठा था, जिन आंखों ने सपने देखें उन आंखों की रौशनी धीरे से जा रही थी, मेरे पूरे होते सपने का चलचित्र बाजार बाबूजी कभी घूम न पाए और उनके जाने का समय मेरे आने के समय से टकराने लगा।

मैंने जिनके सपने को अपना बनाया, उन सपनों के लिए जिया, मरा अब उन्हीं सपनों को शक्ल देने वाले बेशक्ल हो रहे थे, अपनी काघों पर उन सपनों को उठाते, राख के ढेर में उन सपनों को खोजते महसूस हुआ, वो सपने महज़ सपने नही थे, जिनसे मेरे दिल की धड़कनों को ताकत मिलती रही, हर हादसे को उत्सव जिन सपनों के लिए मैं बनाता रहा, वही मेरा असली प्यार था।
प्यार सिर्फ किसी को पाना नही है, किसी के सपनों को अपने भीतर जिंदा रख कर उन्हें अपने सपने में बदल देना भी प्यार है।
मेरे पिता जिन्हें मैं कभी स्वर्गीय नही लिखता श्री रथ कुमार वर्मा जिनकी लेखनी ही उनकी पहचान थी।
70-80 के दशक में वे एक फिल्म लेखक की पहचान पाना चाहते थे, क्योंकि लेखक तो वे थे ही, उन्होंने इस बात को कभी मुझसे कहा नही बल्कि मैंने जाना, महसूस किया और उनका सपना अपनी आंखों में बिठा लिया।
मेरी पहली फिल्म 2008 में पर्दे पर आई और इसी साल ने मुझसे मेरे लिए सपने देखने वाली आंखे छीन ली, कैंसर बला क्या है यार?
गजेंद्ररथ गर्व, फिल्म लेखक, निर्माता निर्देशक 9827909433
