धर्म क्या है?

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धर्म क्या है?
आजकल सोशल मीडिया में धर्म को लेकर भारी भरकम बातें लिखी जा रही है, धर्म के लिए जीने मरने की बातें हो रही है और अभी तो हमारे छत्तीसगढ़ में धर्म परिवर्तन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बना हुआ है।
बीते दिनों रायपुर के एक तथाकथित धर्म प्रेमी के द्वारा खुद को विधायक, मंत्री से उपर होने की बातें बड़े अभिमान के साथ कहते एक वीडियो वायरल हुआ और उस पर सफाई भी आई फिर देखते ही देखते उसके पक्ष और विरोध में बोलने लिखने वालों की होड़ सी लग गई!
टीवी चैनल से लेकर अखबार और डिजिटल माध्यमों से धर्म के धर्माधिकारी का बयान दिखलाए जाने लगा, नही मैंने धर्म की बात कही! धर्म के साथ जो खड़ा है वही सबसे बड़ा है?

क्या धर्म, कौन सा धर्म, कैसा धर्म?
आखिर धर्म की परिभाषा क्या है, कुछ साधु बाबा सरीखे लोगों का कार्यक्रम आयोजित करना धर्म है?
क्या धर्म को प्रचार की जरूरत है?

हिंदू धर्म या सनातन इतना कमजोर है की उसे मानने वालों को कार्यक्रम आयोजित कर धर्म के विषय में उनकी याददाश्त ताजा करनी पड़ती है?
सबको पता है राजधानी अथवा प्रदेश में आयोजित होने वाले बड़े बड़े तथाकथित धर्म प्रचारक बाबाओं का आयोजन राजनीति से प्रेरित रहा है?

तो क्या धर्म और राजनीति साथ साथ चलती है, फिर राजनीति इतनी गन्दी क्यों मानी जाती है अगर उसमें धर्म निहित है? क्या राजनीति से धर्म का ह्रास हो चुका है?
क्या लोगों की भीड़ को आमंत्रण देने के उद्देश्य से ऐसे धार्मिक आयोजन कराए जाते हैं जिसके लिए एक परिचित भीड़ हर जगह एक ही शक्ल में उपस्थित रहती है?

रही बात धर्म की तो धर्म है क्या, किस चिड़िया का नाम है धर्म, धर्म का आकार, प्रकार तो परिस्थितियों के प्रभाव से बदलते रहे हैं!
भूख का धर्म रोटी, प्यास का पानी, लक्ष्य का धर्म बलिदान?

राजा का धर्म प्रजा की खुशी और जिसे निर्वाह करते राजा राम ने पत्नी सीता का त्याग किया, ऐसे में मेरे विचार से धर्म जीवन और समाज को संतुलित करने वाला विचार मात्र है?

हम किसी न किसी रिश्ते में जीवन जी रहे हैं जहां हमारे बहुत सारे रूप होते हैं, बेटा, पति, पिता, भाई, दोस्त आदि आदि इन संबंधों में प्रेम, दया, सहयोग की भावना में निहित भाव ही धर्म है अर्थात कर्तव्य का सही दिशा में परिसंचलन ही धर्म का स्वरूप जान पड़ता है?
किसी मजबूर को देख दया का भाव जागृत होना आपके धार्मिकता का प्रमाण है।
अधर्मी पापी की संज्ञा किसे देते हैं? वही न जो अत्याचारी होता है, जिसके भीतर दया, दान का गुण नही होता जो आसामाजिक हो?

ऐसे में धर्म की परिभाषा क्या होगी?
क्या धर्म हमारे ईष्ट से जुड़ा है और अगर जुड़ा है तो सारे धर्म सत्यनिष्ठ होने की बात ही कहते हैं, दया, प्रेम और मानवता का ही भाव बतलाते हैं।

ऐसे में मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है?
दंगों में दो समुदायों में भिड़ंत और उसी भिडंत में कोई किसी मजबूर की जान बचा ले तो वह धर्म से ही प्रेरित है।

मेरा मानना है धर्म को प्रदर्शन की आवश्यकता ही नहीं है, बड़े धार्मिक आयोजन पूजा पाठ धार्मिक यात्रा से आप धार्मिक होने का तमगा ले सकते हैं पर धर्म को समझने के लिए विवेकानंद जैसे एकात्म होना होगा!
मुझे लगता है धर्म किसी सामुदायिक ग्रंथ का लेख नही है बल्कि समुदाय के व्यवहार का दर्पण है!
महान संत गुरु घासीदास के मनखे मनखे एक समान जैसे अमृत वाक्य ही वास्तविक जीवन का धर्म ज्ञान है।
हम सब एक हैं, किसी वर्ण का जाति का समुदाय का विस्तार आचरण की शुद्धता के लिए हुई होगी?

गजेंद्ररथ गर्व

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