SIR पर एक पत्रकार का सटीक विश्लेषण…जरूर पढ़ें!
एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग को अपनी भाषा पर पहले काम करना चाहिए। जन सामान्य को इसका मतलब ही नहीं मालूम। उल्टे अच्छे-खासे पढ़े-लिखे भी डर गए हैं कि हमारा नाम कट जाएगा तो सरकारी सुविधाएं नहीं मिलेंगी।
एसआईआर निर्वाचन आयोग का काम है, एक संवैधानिक संस्था का, इसकी प्रक्रिया राजनीतिक नहीं हो सकती, पार्षद-विधायक का इसमें कोई काम नहीं है। बीएलओ को फ़ार्म बाँटने हैं, मतदाताओं को उन्हें पूरित करना है और बीएलओ को ही उन्हें कलेक्ट करना है यह जाँचते हुए कि जिसके नाम पर फार्म है वो अपने दिए पते पर उपलब्ध है या नहीं।
बहुत जगहों पर तो वोटरों से कहा जा रहा है कि फलानी जगह पर फार्म उपलब्ध है, आकर ले जाओ और भरकर वापस जमा कराने भी आ जाओ, नहीं तो नाम कट जाएगा। मतलब जो काम आयोग को प्रशासनिक व्यवस्था से कराना है, उसे नेता जनता से करा रहे हैं और घर बैठे चुनाव में बहुत काम आने वाला डेटा भी प्राप्त कर रहे हैं। जनता भी इतनी मासूम है कि बिना सोचे कि ऐसे कैसे सरकारी सुविधाएं नहीं मिलेंगी, होड़ में लग गई है और फ़ार्म में फोटो समेत जानकारी चस्पा कर ख़ुद अपनी वैयक्तिक जानकारी आयोग को नहीं नेता को सुपुर्द कर रही है। ऐसे तो अगर मैं कहीं का विधायक और पार्षद हूँ तो फॉर्म बँटवाकर उसे जमा कराकर वोटर लिस्ट की कांट-छाँट कर सकता हूँ क्योंकि बीएलओ भी मेरे भरोसे है। एक तरह से ये उनके लिए फ्री का डेटा कलेक्शन भी है। बिना सर्वे-बिना संपर्क नेता अपने क्षेत्रीय मतदाताओं को पाले में ला सकते हैं। यह तो बहुत बड़ी ग़फ़लत है। लग रहा जैसे आयोग नेताओं को वोटर चुनने का अधिकार दे रहा है। एसआईआर वोटर लिस्ट की शुचिता के लिए है, यहाँ तो उल्टा हो रहा है।
एसआईआर का फ़ार्म नहीं तलवार हो गया है कि नहीं मिला और नहीं भरा, तो भारतीय होने की आइडेंटिटी खतरे में पड़ जाएगी। मीडिया को इस पर ख़बरें करनी चाहिए। आमजन के लिए बहुत क्लीयर शब्दावली में प्रक्रिया का विवरण जरूरी है और यह मीडिया ही कर सकता है। आयोग तो अपनी प्रक्रिया ही नहीं समझा पा रहा।
निर्वाचन आयोग को एसआईआर की प्रक्रिया की ज़मीन पर पड़ताल भी करनी चाहिए कि संवैधानिक प्रक्रिया का कहीं राजनीतिक इस्तेमाल तो नहीं हो रहा।
अतः तापस की कलम से…सौजन्य फेसबुक
