छत्तीसगढ़ की लोकगायन परंपरा की अमर आवाज और पंडवानी को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। रायपुर स्थित एम्स अस्पताल में रविवार तड़के उनका निधन हो गया। वह 70 वर्ष की थीं और लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
देश-दुनिया में दिलाई छत्तीसगढ़ को पहचान
तीजन बाई ने भारत के साथ-साथ दुनिया के कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई। उनकी कला ने लोक परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और लाखों लोगों को भारतीय लोक संस्कृति से जोड़ने का काम किया।
गनियारी में होगा अंतिम संस्कार
परिजनों ने बताया कि उनका पार्थिव शरीर रायपुर से उनके पैतृक गांव गनियारी ले जाया जाएगा, जहां अंतिम दर्शन के बाद पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके निधन की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में प्रशंसक और शुभचिंतक गांव पहुंचने लगे हैं। परिजनों ने सभी से दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने और अंतिम दर्शन के लिए गनियारी पहुंचने की अपील की है। डॉ. तीजन बाई का निधन केवल एक महान लोकगायिका का जाना नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की उस जीवंत सांस्कृतिक विरासत की अपूरणीय क्षति है, जिसने पंडवानी जैसी लोककला को विश्व मंच पर सम्मान दिलाया।
13 साल की उम्र में पंडवानी से जुड़ाव
तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ते हुए मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई। तीजन बाई ने 13 साल की उम्र में सबसे चंद्रखुरी में अपनी प्रस्तुति दी। तीजन बाई ने भारत के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी समेत अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोककला का डंका बजाया। उनकी कला की सराहना देश-विदेश में हुई। तीजन बाई को कला क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले, जिनमें प्रमुख हैं- पद्मश्री (1988) संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995) पद्मभूषण (2003), पद्म विभूषण (2019)
डॉक्टर तीजन बाई का अवसान कला और साहित्य जगत को बड़ा धक्का है, वे छत्तीसगढ़ फिल्म एसोसियेशन की अतिथि अध्यक्ष थी उनके निधन पर CFA प्रवक्ता गजेंद्र रथ वर्मा ने गहरा शोक व्यक्त किया है और पुण्यात्मा की सद्गति के लिए कामना की है।
