छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय राजनीतिक दलें कैसा खेल खेलती हैं इसका बड़ा उदाहरण अभी वर्तमान में मनरेगा नाम परिवर्तन का विरोध करती कांग्रेस और दूसरी और मनरेगा को नए नाम से प्रेषित करती भाजपा सरकार और हद तो तब है जब हमारे ही स्थानीय लोग अपनी जल जंगल जमीन को लुटता हुआ देखने के बावजूद भी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रोपेगेंडा में फंसकर अपनी राजनीति चमकाने का दिवास्वप्न देख रहे हैं।
छत्तीसगढ़ की वास्तविक स्थिति देखिए अंधाधुंध औद्योगिकीकरण के चलते खेती जमीनों का रकबा लगातार कम हो रहा है, जंगलें काटी जा रही है, पत्थर और कोयले की खदानें बनाई जा रही है जहां आम छत्तीसगढ़ियों को रोजगार नहीं मिल रहा!
वहीं राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से जुड़े आम छत्तीसगढ़िया न जाने कैसा राजनीतिक चरस पिया हुआ है, क्यों उन्हें अपने प्रदेश की बर्बादी नहीं दिखती, अपने लोगों के चेहरे जो दुख और डर से सहमे हुए हैं, नहीं दिखते! आखिर इस छत्तीसगढ़ में कैसी राजनीति चल रही है?
बापू की पुण्यतिथि में इन राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को बापू के नैतिक मूल्यों से ज्यादा, उनकी बातों, उनके संस्कारों से कहीं ज्यादा उनके नाम पर चलाए जा रहे योजनाओं का हिसाब किताब महत्वपूर्ण लगता है?
एक ओर जहां कांग्रेस मनरेगा बचाओ का नाम देकर चक्काजाम करती दिख रही है तो हास्यास्पद तरीके से दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी जीबी राम जी जैसे परिवर्तित नाम के बाद अपने कार्यकर्ताओं सहित अपने सांसद विधायकों के साथ कार्यशाला कर रहे हैं!
किस लिए कार्यशाला? कार्यशाला करना ही है तो हसदेव जंगल की कटाई पर करिए लगातार उद्योगों से निकलते भयंकर प्रदूषित कर देने वाले प्रदूषण के लिए करिए, बेरोजगारी में नशे का सहारा लेकर जिंदगी खत्म करने वाले युवाओं के लिए कार्यशाला कीजिए?
अजब गजब सी राजनीति है यह!
यहां वास्तविक मुद्दे नगण्य हो जाते हैं और बेकार की बातों पर सरकारें मचलती रहती हैं !
हम आप जरा सोचें की क्या हमारे पुरखों ने ऐसे ही दिनों के लिए पृथक छत्तीसगढ़ के लिए कुर्बानियां दी? क्या ऐसी ही परिस्थितियों में अपनी पीढ़ियों को जिंदा देखने लड़ाइयां लड़ी?
आप देखिए सरकारें क्या कर रही हैं, मीडिया को कब्जे में करने के लिए उन्हें हर महीने करोड़ों रुपए बांट रहे हैं!
सूचना अधिकार से प्राप्त दस्तावेज की बात करें तो छत्तीसगढ़ जनसंपर्क संवाद ने 18 करोड़ से भी ज्यादा की राशि 6 महीनों में बड़े-बड़े टीवी चैनल को बांट दिए बस इसलिए कि उनके द्वारा जनता को बरगलाया जा सके, मुद्दों से भड़काया जा सके और जनता के सवालों को उन तक पहुंचने से रोका जा सके?
क्या हो रहा है मेरे छत्तीसगढ़ में? ऐसा कभी हमने सोचा है?
तो सोचिए जरा!
आपको दिखाए जाने वाले चमक दमक के पीछे झांकिए जरा!
फिल्म सिटी छत्तीसगढ़ में बन रही है जहां मुश्किल से प्रादेशिक फिल्में अपना बजट निकाल पाती हैं, आखिर किनके लिए छत्तीसगढ़ को भौतिक रूप से सजाया संवारा जा रहा है?
क्या इस औपनिवेशिक राज्य छत्तीसगढ़ को उत्तर भारत के राज्यों के लिए व्यापारिक केंद्र बनाने का षड्यंत्र है?
हमारे स्थानीय मूल्यों को क्यों मान्यता नहीं मिलती, क्यों हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा हमारे भाषाओं को छोटा बताया जाता है, क्या एक बड़ा षड्यंत्र नहीं है कि हमें अपने ही घर में इतना कमजोर कर दिया जाए कि हम किसी से सवाल ही ना कर सके?
सवाल करें भी तो वह अपराध हो जाए! ऐसा विकास तो हमारे पुरखों ने नहीं सोचा था, ऐसा छत्तीसगढ़ तो हमारे शहीदों ने नहीं सोच रहा होगा जहां उनके स्थानीय छत्तीसगढ़िया ही शोषित हो, पीड़ित हो और दूसरी ओर औपनिवेशिक बाजार बना कर कॉर्पोरेट इस मिट्टी को नोच लें, लूट लें!
अपनी छोटी-छोटी जरूरतों तुष्टियों के लिए अपनी मिट्टी से अपने लोगों से अपने आप से धोखा करने वालों से मैं निवेदन करना चाहता हूं यह राष्ट्रीय राजनीतिक दलें आपके खूबसूरत छोटे से राज्य को कोयले की खदान में बदलना चाहते हैं, सीमेंट की धूल में झोंक देना चाहते हैं!
क्या आप इसे बचाने के लिए कुछ भी नहीं करेंगे, कब करेंगे? तब, जब सब कुछ खत्म हो जाएगा?
अपील: गजेंद्ररथ गर्व, संपादक प्रदेशवाद , प्रदेश अध्यक्ष, छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ, छत्तीसगढ़
