हाईकोर्ट का संवेदनशील मामले में अहम फैसला…पढ़िए पूरा मामला!

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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील मामले में अहम फैसला सुनाया है। तरुण सेन नामक युवक, जो करीब छह साल से दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के तहत जेल में बंद था, उसे अब कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह सिद्ध करने में विफल रहा कि पीड़िता उस समय नाबालिग थी।

रायपुर की विशेष अदालत ने सुनाई थी सजा
घटना 8 जुलाई 2018 की है, जब शिकायतकर्ता के अनुसार तरुण सेन ने एक लड़की को बहला-फुसलाकर भगा लिया और उसके साथ कई दिनों तक संबंध बनाए।

लड़की के पिता ने 12 जुलाई को एफआईआर दर्ज कराई, और 18 जुलाई को लड़की को दुर्ग से बरामद किया गया। इसके बाद रायपुर की विशेष अदालत ने 27 सितंबर 2019 को IPC की धारा 376(2)(एन) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत आरोपी को 10-10 साल की सजा सुनाई थी।

सुनवाई के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य आए सामने
तरुण सेन ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां सुनवाई के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। स्कूल रजिस्टर में लड़की की जन्मतिथि 10 अप्रैल 2001 दर्ज थी, लेकिन उसने कोर्ट में बयान दिया कि उसका जन्म 10 अप्रैल 2000 को हुआ था। अभियोजन पक्ष कोई ठोस दस्तावेज जैसे जन्म प्रमाणपत्र, मेडिकल ऑसिफिकेशन टेस्ट आदि पेश नहीं कर सका।

महत्वपूर्ण यह भी रहा कि पीड़िता ने कोर्ट में साफ कहा कि वह तरुण के साथ अपनी मर्जी से गई थी और दोनों के बीच प्रेम संबंध थे। मेडिकल रिपोर्ट में भी उसके शरीर पर जबरदस्ती के कोई निशान नहीं पाए गए।

केवल स्कूल के दस्तावेज पर्याप्त नहीं- हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल स्कूल के दस्तावेज पर्याप्त नहीं हैं, जब तक उसे तैयार करने वाले व्यक्ति की गवाही न हो। जस्टिस अरविंद वर्मा की एकलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए साफ किया कि जब नाबालिगता साबित नहीं होती और संबंध सहमति से बने हों, तो यह रेप नहीं कहा जा सकता।

कोर्ट ने आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश देते हुए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है। इस फैसले से ना सिर्फ आरोपी को न्याय मिला है, बल्कि इसने अभियोजन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

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