जहां कलम से न्याय मिलना था, वहां फायरिंग हो रहीहै,
सदस्यता सूची पर ऐसा बवाल कि पत्रकार ही खबर बन गए
रायपुर कहते हैं, पत्रकार सत्य के लिए लड़ता है, पीड़ित को न्याय दिलाता है, और सच की चौखट पर खड़ा रहता है। प्रेस क्लब से दूर रखने के लिए वास्तविक पत्रकारों को किस कदर प्रताडित किया जा रहा है। आखिर क्यू चली गोली इसके कारणों की समीक्षा क्या जवाबदार कर पाएगेँ? लेकिन रायपुर प्रेस क्लब में इस बार सत्य नहीं, गोली चली है। और गोली भी ऐसी कि पूरे प्रदेश की पत्रकारिता शर्मसार हो गई। सवाल सीधा है ये प्रेस क्लब है या आखाड़ा? 300 सदस्य, 1000-1000 रुपये और एक चुनावी खेल कहानी शुरू होती है लगभग 9 महीने पहले। चुनाव सिर पर था। प्रेस क्लब ने करीब 300 लोगों से एक-एक हजार रुपये लेकर सदस्य बना दिया। बस, फिर क्या था। चुनावी गणित बिगड़ने का डर सता गया। विरोधियों को लगा कि ये नए 300 वोट एक तरफा जाएंगे, तो कुर्सी हाथ से निकल जाएगी। तो बड़ा ही सुनियोजित तरीके से नए सदस्यों की सदस्यता सूची पर अडंगा लगा दिया गया।
वोटिंग राइट ही खत्म
नए सदस्यों ने 130 दावा-आपत्ति लगाई, लेकिन निर्वाचन अधिकारी ने सुनना तक जरूरी नहीं समझा। सिर्फ एक महिला और एक पुरुष को एहसान के तौर पर वोट देने दिया गया। बाकी 298? जाओ, कोर्ट जाओ।और पत्रकार गए भी।
नई सूची तो और भी रंगीन
अब जो नई सूची आई है, वो तो और भी गजब है।सीरियल नंबर 221 से 352 तक, फिर 19 विशेष आमंत्रित सदस्य, 10 सहयोगी सदस्य, और 64 लोगों को विचाराधीन सूची में डाल दिया। इन 64 में वो 10 पत्रकार भी हैं जो कोर्ट गए थे, 300 में से 3 से ज्यादा लोगों के साथ हुए अन्याय के खिलाफ। अब वर्तमान पदाधिकारी उन 10 से माफीनामा लिखवा रहे हैं। लिख कर दो कि हमसे गलती हो गई। कुछ बेचारों ने लिख कर भी दे दिया, फिर भी सूची से बाहर।वाह! ये कौन से संविधान, कौन से कानून में लिखा है, जरा बताइए तो?
पिता, बेटा, HR और डेस्क वाले सब पत्रकार
प्रेस क्लब की कैसी परंपरा ? साल भर आवेदन पड़ा रहेगा, चुनाव आया तो सदस्यता की बाढ़ आ जाएगी। इस बार की सूची में तो कमाल ही हो गया। एक-एक संस्थान से आधा दर्जन सदस्य। पिता भी पत्रकार, बेटा भी पत्रकार। कभी फील्ड में नहीं दिखे, डेस्क पर बैठे हैं, यहां तक के HR भी पत्रकार सूचि में शामिल हैं, दूसरे प्रांत में पढ़ाई कर रहे हैं सबको सदस्य बना दिया गया,और जो रोज फील्ड में पसीना बहा रहा है, वो सूची से एक झटके में बाहर।
पंजीयक कार्यालय की भूमिका संदिग्ध
किसी भी क्लब का संचालन पंजीयक की देखरेख में होता है। बीते एक साल में पंजीयक को दर्जनों पत्र लिखे गए, मार्गदर्शन मांगा गया, जवाब तक नहीं आया।लेकिन पत्रकारों के एक धड़े ने शिकायत की तो 24 घंटे के भीतर एक्शन। इससे साफ है, किंग-पिन कोई और है, खेल कोई और खेल रहा है।
अब अर्धनग्न प्रदर्शन की तैयारी
हवाई फायरिंग के बाद तो पूरे प्रदेश में रायपुर प्रेस क्लब की किरकिरी हो रही है। जो पत्रकार पैसा पटाने के बाद भी सूची से बाहर हैं, वो अब मौन प्रदर्शन से लेकर अर्धनग्न प्रदर्शन तक की तैयारी कर रहे हैं।कुछ तो फायरिंग पर भी चुटकी ले रहे हैं — “कलम वाले अब कट्टा वाले हो गए।”न्याय दिलाने वाली संस्था के सदस्य ही आज न्याय के लिए भटक रहे हैं। इससे बड़ा कलंक पत्रकारिता के लिए और क्या हो सकता है? ये प्रेस क्लब है, या चुनावी चक्रव्यूह?
जारी सूचि पर एक नजर…
1. सीरियल नंबर 221 से 352 तक:
352 – 221 + 1 = 132 सदस्य
2. फिर उसके बाद:
132 + 19 विशेष आमंत्रित + 10 सहयोगी = कुल 161 सदस्य और अगर 64 विचाराधीन को भी जोड़ दें तो –
161 + 64 = कुल 225 सदस्यतो जारी सूची में 161 लोगों को फाइनल किया गया है, और 64 को विचाराधीन में लटका दिया गया है।
पहली बार किसी प्रेस क्लब में विचारीधीन सूचि जारी हुआ है,जबकि पैसे क्लब के खाता में जमा है।
छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष गजेंद्ररथ ‘गर्व’ ने प्रेस क्लब रायपुर में परप्रांतीय पत्रकारों का कब्जा बताया और खुलासा किया है कि वे 2018 से प्रेस क्लब के सक्रिय सदस्य रहें और कई बार मतदान भी किया लेकिन बीते वर्ष के मतदाता सूची से उन्हें बाहर कर दिया गया जब पता किया गया तो किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
इस बार भी उनका सदस्यता प्रतिवेदन जमा हुआ पर नई सूची में भी नाम शामिल नहीं किया गया है!
वे इस मामले पर कोर्ट जा रहे हैं और छत्तीसगढ़ की राजधानी में प्रेस क्लब की जो दशा है उसे लेकर बड़ा आंदोलन छेड़ने की तैयारी है, वे स्थानीय पत्रकारों को एकजुट कर रहे हैं और प्रेस क्लब में मनमानियों के लिए आवाज उठाने रणनीति बना रहे हैं, आने वाले समय में स्थानीयता और प्रादेशिकता का प्रभाव प्रेस क्लब में देखने को मिलेगा।
