विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है?

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विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है?

याद करिए 25 साल पहले का छत्तीसगढ़!
शांत, मगन, अपनी धुन में जीता किसान और आज 25 साल बाद का छत्तीसगढ़ अपने भीतर छत्तीसगढ़ खोज रहा है?
तब कहीं किसी अखबार में हत्या की खबर, खबर मात्र नही भावनाओं का भूचाल होता था, अरे बाप रे बाप!! जान से मार दिया! मनुख मार को इतनी बद्दुआ लगती की सुन सुन कर लोग हत्या जैसे अपराध का सोंच कर ही सिहर जाते थे, मनुख मार तो छोड़िए कहीं किसी पशुधन की अनजाने हत्या हो जाती थी तब लोग उस पाप से उबरने के उपाय करते थे पर अब तो हर अखबार की पहली खबर हत्या, मौत, अमानवीयता से शुरू होती है!
ऐसा क्या इसलिए है की आज हम एक स्वतंत्र राज्य में विकास की सरपट दौड़ के बीच रह रहे हैं या फिर इस लिए की इस राज्य को हम वैचारिक रूप से संवार नही पाए?
इसका स्वरूप इतना कुरूप हो सकता है यह भनक तनिक भी हमारे पुरखों को रहा होता तो वे इस पहचान के लिए जान न देते?

आखिर उन्होंने ऐसे छत्तीसगढ़ की कल्पना तो नही की थी?
आज हम जब “अरपा पैरी के धार महानदी हे अपार” गाते हैं तब इस महान प्रदेश की कल्पना यकायक माथे पर कौंध जाती है लेकिन आज उस कल्पना की सच्चाई बिल्कुल अलग है अपार महानदी खंडित हो चुकी है, चमकदार हरियाली, काली अमावस्या में तब्दील हो चुकी है!
बड़े बड़े उद्योगों की चिमनियां कुकुरमुत्ते से उग आए हैं, धूल धुआं और सरपट बेचाल भागती बड़ी बड़ी ट्रेलर साक्षात यमदूत बने दौड़ रहे हैं।
भोले भाले किसान अपनी खेतों से दूर फैक्ट्रीछाप नौकरी वाले हो चुके हैं, अब गांवों में चौपाल के जगह शराब की पार्टियां तालाब में मंदिरों के चबूतरों पर डिस्पोजल और चखनों के पन्नियां बिखेर रही हैं!
शहरों कस्बों से दिखावे और चोचलेबाजी की रईसी, संबंधों का मुंह चिढ़ा रही हैं?

डिजिटल होता समाज अब वर्चुवल रास्ते नाप रहा है, आभाषी दुनिया वालों ने मिट्टी की सुगंध को भुला दिया है शायद!
हम अपनी सुविधाओं और विकास की कीमत चोरी, डकैती, लूट, हत्या, बलात्कार जैसे अपराधों के बीच जीने की आदत के साथ चुका रहे हैं और अभी तो ये शुरुआत है न जाने आगे की पीढ़ियों को क्या से क्या होते देखना होगा?

नए छत्तीसगढ़ ने नई पहचान और सत्ता के साथ कूआनंद, लालच, धूर्तता, वैमनश्य तो दिया ही लाखों भूखे भौतिकवादियों के साथ कॉरपोरेट का नशा भी परोस दिया।
अब पढ़े लिखे लोग प्रकृति को बेच कर जिंदगी में ऐश करने के नुस्खे बताते हैं, कहते हैं सैकड़ों साल घसीट कर जीने से अच्छा मजे से चालीस-पचास साल जियो!
नोच लो इस धरती की कोख से खनिज, अपने पैरों के नीचे खोद लो अपनी कब्रें, आखिर एक दिन तो मरना ही है न?
तो क्या अपनी मौत से पहले मार डालें अपनी पीढ़ियों को, प्रकृति को?

उत्तर प्रदेश, बिहार, मुंबई की जिन घटनाओं का जिक्र सुनकर हमारे पुरखे हमें गांवों में सहेजते रहे अब वही सारी घटनाएं हमारे गांवों तक पहुंच चुकी हैं!

तीन लोगों की दौड़ा दौड़ा कर चाकू से गोद कर हत्या, नशे में नाबालिक ने चाकू मारा, रास्ता रोककर डकैती, दिनदहाड़े चोरी, 6 साल की बच्ची से रेप और न जाने कैसे कैसे विभत्स परिचय सबले बढ़िया छत्तीसगढ़ियों के सी-आर खराब कर रही हैं?

क्या उपाय है इस उफनते अपराध को रोकने का?
क्या जतन करें अपनी महतारी की आंचल को मैले होने से बचाने के लिए?
किस भभूति का फूंक मारें विचलित होती नई पीढ़ी के माथे पर?
या फिर यही कीमत है विकासशीलता की, नए जमाने में पांव रखने की, खुद को मॉर्डन कहलाने की?
इस विनाश के बीच विनिर्माण की कोई तो पटकथा लिखनी होगी, कौन लिखेगा, किसके हाथ में है वो वरदान जो दुनिया बदलेगी?

गजेंद्ररथ गर्व, संपादक- प्रदेशवाद

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