छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों बड़े रोमांचक मोड़ पर है। तीन नए मंत्री बनने की चर्चा है और मीडिया व जनता का उत्साह ऐसा मानो अब रायपुर से निकलते ही सीधा सिंगापुर की मेट्रो पकड़ लेंगे, और बिलासपुर की सड़कें बर्लिन जैसी चमकने लगेंगी।
पर जनाब, सरकार को बने हुए तो लगभग दो साल होने को हैं। ज़रा यह तो देखिए कि जो मंत्री पहले से गद्दी संभाले बैठे हैं, उन्होंने इन दो सालों में कितनी क्रांति कर दी? बेरोज़गारी का हल निकला या सिर्फ़ वादों की फाइलें मोटी हुईं? स्वास्थ्य सेवा सुधरी या अब भी मरीज़ स्ट्रेचर की जगह ठेले में जाते हैं? किसान खुशहाल हुए या अब भी खाद खरीदने और धान बेचने में लाइन ही सबसे बड़ी उपलब्धि है?
मीडिया भी गजब है नए मंत्रियों की खबर को ऐसे परोस रहा है जैसे टीवी सीरियल का नया हीरो आ गया हो और अब सारी कहानी पलट जाएगी। कोई पूछे कि भाई, जो पुराने हीरो थे, उनका रोल कैसा रहा? या फिर कहानी वही ढाक के तीन पात है?
असल सवाल यही है क्या हम हर बार नई नियुक्तियों के उल्लास में बस तालियाँ ही बजाते रहेंगे, या कभी मंत्रियों के कामकाज पर आईना भी दिखाएँगे? वरना छत्तीसगढ़ का विकास “भाषणों के मलेशिया” और “कागज़ी सिंगापुर” तक ही सीमित रह जाएगा।
पत्रकार जयदास मानिकपुरी की FB वॉल से