प्रदेशवादी अस्मिता की गुहार कब तक ठुकराएगी राष्ट्रवादी सरकार?
25 बरस के छत्तीसगढ़ ने अपनी प्रादेशिक अस्मिता के लिए अंगड़ाई ली है!
यूं तो अब तक भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने इस प्राकृतिक प्रदेश की प्रादेशिकता को दांव पर लगाकर ही राजनीति की है लेकिन कुछ एक वर्षों में छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना नाम की मशाल प्रदेशवाद की भावना को रोशन कर रही है और शायद यही कारण है कि अब प्रादेशिक अस्मिता के लिए एक ज्वाला सी जल पड़ी है, आने वाले दिनों में यह ज्वाला आग बनाकर भड़केगी और प्रदेश की अस्मिता के लिए अनहद हो जाएगी!
राजधानी रायपुर का पचपेड़ी नाका न सिर्फ रायपुर जिले में बल्कि प्रदेश भर में एक चिर परिचित शब्द है और परंपरागत स्थान भी, पचपेड़ी नाका अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा एक बड़ा नाम है जिसे बदलने की कोशिश ने प्रदेशवाद को भड़का दिया!
अब तक सब चुपचाप सहने वाले छत्तीसगढ़िया अब अपनी अस्मिता की गुहार लगा रहे हैं।
लगातार ठगने वाली राष्ट्रीय राजनीतिक दलें अब इस बात के लिए तैयार रहें की आने वाला कल उनकी मनमानियों पर बड़ा अंकुश लगाने वाला है!
दशकों से भीतर ही भीतर छत्तीसगढ़िया वाद की आग सुलगाती एक गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना जो लगातार आम छत्तीसगढ़ियों के दुख दर्द में मरहम बना हुआ है और अब इसकी प्रादेशिक राजनीतिक विंग जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी भी अस्तित्व में आ चुकी है, शायद यही वह वक्त है जिस वक्त में प्रदेशवाद की ज्वाला आग की लपटे बन सकती है?
पहली बार छत्तीसगढ़ में ऐसा हुआ की नामकरण को लेकर जोन कार्यालय में सेना घुसी और नारेबाजी करते हुए इस तरह की प्रशासनिक दुःसाहस का प्रतिकार करते हुए दमखम के साथ अपनी अस्मिता पर सवाल किया, ऐसा होना भी चाहिए था।
राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में भी छत्तीसगढ़िया हैं पर क्यों नहीं उठाते अपनी अस्मिता से खिलवाड़ पर सवाल?
पार्टी चाहे बीजेपी हो या फिर कांग्रेस वहां भी छत्तीसगढ़ के लोग ही पार्टी पदाधिकारी, विधायक, सांसद, महापौर और पार्षद जैसे महत्वपूर्ण पदों पर है तो आखिर क्यों उन्हें इस बात का ख्याल नहीं आता कि उनके अस्मिता के साथ कोई खेल हो रहा है या फिर राष्ट्रवाद के नाम पर उन्हें डरा कर रखा जाता है? और अगर वह डर भी रहे हैं तो उनकी राजनीति किस काम की?
इस प्रदेश में यहां के लोगों ने आपको अपना प्रतिनिधि बनाया है तो अपनी प्रादेशिकता, अस्मिता के रखवाले के रूप में आपको देखती हैं और आप अगर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं तो शायद प्रदेश में बहुत बड़े राजनीतिक परिवर्तन का शंखनाद हो चुका है!
एक ऐतिहासिक महत्व की जगह का मात्र किसी समुदाय विशेष की मांग पर उनकी खुशी के लिए नाम परिवर्तन किया जा रहा है तो सचमुच यह बात इस प्रदेश के लोगों के लिए अपने अस्तित्व पर गहरा संकट है और कोई भी यह नहीं चाहता कि उन्हें अपने ही प्रदेश में अपनी अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़े?
छत्तीसगढ़ ने अपने नवनिर्माण के बाद से ही अपने साथ होते हुए खिलवाड़ को सहा है, यहां की भोली भाली जनता अपनी भाषा संस्कृति, तीज त्योहारों के साथ हो रहे दोगलेपन से अब तंग आ चुकी है! उनके तालाबों को छठ घाट बना दिया गया क्यों? आप अपनी पूजा करिए न, नाम बदल कर पूजा करने की जरूरत क्यों?
और अब तो उनके पुरखों के पहचान को चुनौती दी जा रही है, कब तक सबसे बढ़िया बने रहें छत्तीसगढ़िया?
उनकी भाषा देहाती, उनकी संस्कृति पिछड़ी हुई, उनके रहन सहन जंगली! ऐसा कहने वाले इस प्रदेश से नही है और उनकी धृष्टता देखिए अपना यहां होना भी उन्हें इस प्रदेश के लोगों पर अहसान लगता है क्यों?
क्या आप लोगों को आमंत्रण भेज कर बुलाया गया है या आप लोगों ने ही हमारे भोलेपन को हमारी बेवकूफी समझी? और समझी भी तो जताया क्यों?
अब आप लोगों के कर्म आप सब पर भारी पड़ने वाली है, समय रहते इस मिट्टी को अपनी मां जैसी इज्जत देना शुरू कर दो, यहां के लोगों और उनकी भाषा के साथ उनके पुरखों को सम्मान देना आपकी जिम्मेदारी है वर्ना…क्रमशः
गजेंद्ररथ ‘गर्व’
प्रदेश अध्यक्ष
छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ