‘सगा जान के वोट देन’
पढ़ें गजेंद्ररथ का शानदार विश्लेषण!
भारतीय राजनीति में जनता अपना वोट उम्मीदवार की जाति, धर्म, स्थानीयता और प्रभाव देख कर तय करती है!
शायद! इसीलिए सत्ता निरंकुश और नेता बेलगाम हो जाते हैं।
छत्तीसगढ की राजधानी से लगे तिल्दा जनपद स्थित एक गांव अल्दा से ऐसी ही एक खबर आई है।
गांव के लोग स्पंज आयरन कंपनी लगने का विरोध कर रहे हैं, जनसुनवाई हो चुकी है और सरकार के पर्यावरण विभाग ने कंपनी को क्लीन चिट दे दिया है पर ग्रामीणों का आरोप है की जनसुनवाई फर्जी तरीके से की गई, वे अपने स्थानीय विधायक और कैबिनेट मंत्री टंक राम वर्मा पर उद्योगपति को संरक्षण देने का आरोप भी लगा रहे हैं!
ग्राम अल्दा कुर्मी बाहुल्य क्षेत्र है साथ ही पूरा बलौदा बाजार विधानसभा क्षेत्र ही कुर्मी पिछड़ा वर्ग बाहुल्य है और इसी जातिगत गणित के चलते बीजेपी ने टंक राम वर्मा को टिकट दिया।
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान एक ग्रामीण, पत्रकार से कहता दिख रहा है की उसने टंक राम को अपना जाति भाई जानकर वोट दिया था लेकिन आज जब उसकी बारी है तब उसने अपनी जाति के लोगों का साथ न देकर उद्योगपति का साथ दिया, ग्रामीण ने अपने चुनाव पर पछतावा होने की बात कही और अगली बार सोंच समझ कर योग्य व्यक्ति को वोट करने की बात भी!
राजनीति में जातिगत समीकरण बनाम योग्यता!
भारतीय राजनीति में जाति समीकरण को पहली प्राथमिकता मिलती है चाहे वह राज्य कोई भी हो, राजनीतिक पार्टी भी क्षेत्र में जाति विशेष के लोगों की संख्या देखकर उम्मीदवार चुनती है और सफल भी होती हैं, जनता को लगता है उनका नेता उनकी जाति का है पर असल में वह पार्टी का पहले होता है न की जाति का?
ग्राम अलदा में लोगों का भ्रम टूटा है! उन्हें अपना नेता अब अपनी जाति का नही बल्कि पार्टी का दिख रहा है, जो की वह पहले से ही था।
राजनीतिक जानकारों का कहना है, बीजेपी बहुत बड़ी कॉरपोरेट पार्टी है और रणनीति, कूटनीति में माहिर भी, पार्टी को पता था छत्तीसगढ़ रत्नगर्भा है, अनमोल मिनरल्स से युक्त है, खजाना भरा है यहां की मिट्टी में, तो चाल देखिए आदिवासी समाज से मुख्यमंत्री बना दिया और उसी चेहरे पर अब प्रदेश की जल जंगल जमीन पर लूट मचा रही है?
हसदेव का हराभरा जंगल अब कोयले की खान में तब्दील हो चुका, तनमार, मैनपाट, रामगढ़ पहाड़ी और अब बस्तर, कुछ नहीं बचने वाला और इस लूटमार का जिम्मेदार हमारा अपना, हमारी जमीन का ही बेटा, आखिर किसे कहें, किनसे दर्द साझा करें मूलनिवासी? चेहरा तो उसी के भाई का दिखाया जा रहा?
लोग कहते हैं, इस सरकार में किसी मंत्री विधायक को कोई पावर नही बस चेहरे हैं सब? बाकी सारे निर्णय दिल्ली दरबार से हो रहें, हमने तो नेता उनके ऑर्डर पर रिमोर्ट होने के लिए चुना है?
पार्टी ने बड़ी चतुराई से ऐसे लोगों को नेतृत्व दिया है जो अहसान तले दबे रहें, उन्हें इतना बड़ा पद देने का अहसान जो उनकी पार्टी ने किया है?
आप हम देख ही रहे हैं, जिन भावनाओं के साथ जनता ने बीजेपी को सत्ता सौंपी कितनी पूरी हुई?
इससे पहले जिस पार्टी को जनता ने मौका दिया उन्होंने तो लूट और भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड ही बना दिया, घोटालों के मामले में कांग्रेस सरकार ने छत्तीसगढ़ को देश में नेक्स्ट लेवल पर ला दिया।
आखिर जनता भरोसा करे तो किस पर, सब साधु दिखते हैं और सत्ता पाते ही डाकू!
जनता को जाति, धर्म की राजनीति से ऊपर उठ कर लायक लोगों को ढूंढना होगा, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत जरूरतों के साथ स्थानीय भावनाओं की कद्र कर सके।
क्या आपको भी अपने चुनाव पर दुख है?
क्या आपका विधायक आपकी जाति, धर्म का होते हुए भी आपका नही है?
क्या आप अब अपना विधायक चुनने से पहले उसकी योग्यता मापेंगे या फिर से जाति, धर्म या करीबी होने का सुख खोजेंगे?
आलेख: गजेंद्ररथ गर्व
प्रदेश अध्यक्ष – छत्तीसगढ़िया पत्रकार महासंघ, छत्तीसगढ़
प्रदेश प्रवक्ता, मुख्य सलाहकार – गैर राजनीतिक संगठन छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना और छत्तीसगढ़ फिल्म एसोसियेशन
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