क्या छत्तीसगढ़ में कभी लोकल पार्टी सत्ता तक पहुँचेगी?
छत्तीसगढ़ की राजनीति आज़ादी के बाद से ही दो राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और बीजेपी के इर्द-गिर्द घूमती रही है। प्रदेश की जनता पाँच साल बाद इन्हीं दो पार्टियों को सत्ता की चाबी थमा देती है। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या छत्तीसगढ़ में कभी कोई स्थानीय (लोकल) पार्टी खड़ी होकर सत्ता तक पहुँच पाएगी?
दरअसल, छत्तीसगढ़ की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान, यहाँ की आदिवासी और ग्रामीण समस्याएँ, किसानों-मज़दूरों की आवाज़, स्थानीय संसाधनों के दोहन और बेरोज़गारी जैसे मुद्दे बार-बार उठते हैं। मगर राष्ट्रीय दल इन समस्याओं को चुनावी वादों तक ही सीमित रखते हैं। यही वजह है कि समय-समय पर कई क्षेत्रीय दल बने, लेकिन वे जनता का भरोसा जीतने में नाकाम रहे।
लोकल पार्टियों की हार का एक बड़ा कारण संगठन की कमी और संसाधनों का अभाव भी है। वहीं जनता भी “बीजेपी बनाम कांग्रेस” की राजनीति की आदी हो चुकी है। सवाल यही है कि क्या मतदाता कभी इस सोच से बाहर आकर “स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देने वाली पार्टी” को अवसर देंगे?
अगर आने वाले समय में कोई लोकल पार्टी जमीनी स्तर पर मजबूत संगठन खड़ा करती है, ईमानदार नेतृत्व और साफ़ विज़न पेश करती है, तो छत्तीसगढ़ की राजनीति में निश्चित रूप से एक तीसरा विकल्प खड़ा हो सकता है। वरना यहाँ की जनता आने वाले दशकों तक बीजेपी और कांग्रेस को ही बारी-बारी से सत्ता सौंपती रहेगी।
👉 सवाल यही है कि छत्तीसगढ़ की जनता कब तक राष्ट्रीय दलों की राजनीति में उलझी रहेगी और कब अपनी असली आवाज़ को एक “स्थानीय विकल्प” में तलाशेगी?
पत्रकार जयदास मानिकपुरी की fb वॉल से