जब चिड़िया मुझसे मदद मांगने आई…अद्भुत और सच्ची घटना! पढ़िए

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मैं जो बात लिखने जा रहा हूं शायद आप लोगों को भरोसा न हो, यूं लगे कि लिखता है तो लिख दिया होगा!
पर यह बात उतनी ही सच है जितना आप और हम!

जन्माष्ठमी की दोपहरी मैं खेत का मुहाना देखने निकला, कई घण्टे खेत की मेड़ पर बैठा रहा बाबुजी को याद करते, इस खेत से बाबुजी की बहुत सी यादें जुड़ी हैं और जन्माष्टमी ही वह रात थी जब बाबुजी मुझे छोड़ कर चले गए थे।

स्व. रथ कुमार वर्मा

आज जीवन के 45वें साल में बाबुजी की यादें अब भी उतनी ही उजली है मानों कल की बात हो!
दोपहर के 2 बज रहे थे मैं खेत से निकलकर थोड़ा आगे ताला तालाब में बरगद के नीचे जा बैठा, क्या देखता हूं कि एक सल्हई चिड़िया बार बार मेरी ओर आती और जोर जोर से आवाज देती, पलट कर दस कदम आगे ईमली के पेड़ में लौट जा रही थी यह क्रम 2-3 बार हुआ, मुझे लगा वह कुछ बताना चाहती है और मैं उसके पीछे चल दिया।

गजेंद्ररथ गर्व

क्या देखता हूं एक काला नाग चिड़िया के घोंसले पर फन फैलाये बैठा था, घोंसले में बच्चे नही दिख रहे थे, शायद अंडे थे, मैनें वहीं पास पड़े पत्थर उठाये और नागदेव के अगल बगल मारने लगा मेरे वार से पत्तों में आवाज और कंपन हुई परिणाम स्वरूप नाग वहां से भागने लगा, मैं तब तक सांप को डराता रहा जब तक वह भागा नही, चिड़िया भी इस बीच अपने अंडों को बचाने लड़ ही रही थी!

अब पक्षी का शोर थम चुका था, शायद वह अपने अंडों को बचाने में कामयाब हो चुकी थी और अपने घोंसले के पास ही बैठी मुझे निहार रही थी, मैनें भी राहत की सांस ली और वापस अपनी स्कूटी के पास लौट आया।
इस बीच मुझे बाबुजी की डायरी में लिखी वह सच्ची कहानी याद आ गई जिसमें उन्होंने एक चींटी की आत्महत्या का ज़िक्र लिखा है, कई बार बाबुजी ने वह कहानी मुझे सुनाई भी थी, तब मैं उनकी बातों पर ज्यादा गंभीर नही था शायद! लेकिन आज जब एक पक्षी ने मुझे मदद के लिए बुलाया तब मुझे एहसास हुआ सच में चींटी ने आत्महत्या की थी!
एक बात और खरोरा का ताला तालाब यह वही जगह है जहां आज से 45 साल पहले मेरे बाबुजी सुबह स्नान कर मंदिर में जल चढ़ाने गए तो देखा एक व्यक्ति मंदिर के भीतर घण्टे की अकोड से महादेव तक फांसी पर झूल रहा था मारे डर के वे बाहर खड़े सहमे हुए फांसी पर लटके युवक की लाश को देख रहे थे तब तक कई लोग और आ गए जिनमें से एक ने बाबुजी को बताया कि तुमको बेटा हुआ है तुम्हारे घर से बुलावा है।

मां बाबूजी और मैं गजेंद्र

यह बात आई गई हुई, छट्ठी के बाद मेरा नामकरण हुआ मुझे गणेश की संज्ञा मिली इधर बाबुजी को उस आत्महत्या करने वाले युवक के बारे में पता चला, उसका नाम भी गणेश यादव था और बाबुजी में मेरा नाम गजेंद्र रख दिया।
ताला तालाब और बटई भांठा मेरे बाबुजी के पसंदीदा स्थान थे, मैं जब खरोरा में होता हूं इन्ही जगहों पर बाबुजी की यादों को ताजा करता हूं, बीते वक्तों को जीने की कोशिश करता हूं, यूं लगता है बाबुजी मेरे पास, मेरे साथ बैठे बातें कर रहे हैं!

गजेंद्ररथ गर्व 

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