आदिवासी प्रसूता को बंधक बनाए जाने का मामला…पढ़ें!

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छत्तीसगढ़ के गरियाबंद ज़िले से मानवता को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, यहां पैसों की मांग पैसों की मांग पूरी न होने पर एक आदिवासी प्रसूता को उसके नवजात के साथ निजी अस्पताल में पांच दिनों तक कथित तौर पर बंधक बना कर रखा गया जिलापंचायत के अध्यक्ष के हस्तक्षेप के बाद महिला और उसके बच्चे को सुरक्षित घर पहुँचाया गया।

बता दें, आदिवासी महिला भुंजिया जनजाति मामला आदिवासी ब्लॉक मैनपुर के मूचबहल के मालिपारा वार्ड में रहने वाली भुंजिया जनजाति की 23 वर्षीय नवीना चींदा से जुड़ा है। प्रसव पीड़ा के बाद उन्हें ओडिशा के कालाहांडी जिले के धर्मगढ़ स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां सामान्य प्रसव हुआ। भर्ती के दौरान 5 हजार रुपए जमा कराए गए, लेकिन डिलीवरी के बाद अस्पताल प्रबंधन ने 15 हजार रुपए और मांगे।
नवीना की सास दोषो बाई के मुताबिक, पैसे पूरे न होने तक महिला, उसका तीन साल का बेटा और नवजात अस्पताल में ही रोके गए। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। नवीना का पति आंध्र प्रदेश के ईंट भट्ठे में मजदूरी करता है और पैसों की व्यवस्था नहीं हो पाई।
मामले की जानकारी मिलने पर जिला पंचायत अध्यक्ष गौरी शंकर कश्यप ने प्रतिनिधियों को अस्पताल भेजा। बातचीत के बाद अस्पताल प्रबंधन ने शेष राशि स्वेच्छा से देने की बात कही। अध्यक्ष के माध्यम से 5 हजार रुपए का भुगतान किया गया, जिसके बाद एंबुलेंस से जच्चा-बच्चा को सुरक्षित गांव पहुंचाया गया।
बताया गया कि करीब 2000 की आबादी वाले गांव में यह परिवार अकेला भुंजिया जनजाति का है। गांव क्लस्टर में शामिल न होने के कारण विशेष पिछड़ी जनजाति योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया। पीएम आवास स्वीकृत है, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते निर्माण नहीं हो सका।
जिला पंचायत अध्यक्ष ने कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सीएमएचओ को जांच के निर्देश दिए जाएंगे, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सरकारी योजनाओं का लाभ महिला तक क्यों नहीं पहुंचा और लापरवाही कहां हुई।

अस्पताल प्रबंधन की सफाई
अस्पताल संचालक चैतन्य मेहेर ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि किसी प्रकार की जबरन वसूली नहीं की गई। अगर परिजनों ने आर्थिक परेशानी बताई होती तो पहले ही जाने दिया जाता।

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